SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 737
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ६४८ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण ततः करतले देवी देवराजस्य तं न्यधात् । बार्कमये सानो प्राचीवप्रस्फुरन्मणौ ॥१५७॥ जिस प्रकार पूर्व दिशा प्रकाशमान मणियों से शोभायमान उदयाचल के शिखर पर बाल सूर्य को विराजमान करती है, उसी प्रकार इन्द्राणी ने बालजिनेन्द्र को इन्द्र के करतल में विराजमान कर दिया । प्रश्न - इन्द्र के सहस्र नेत्र बनाने का वर्णन किस प्रकार है ? उत्तर-- इन्द्र के सहस्त्र नेत्र- प्रभु की अनुपम सौन्दर्यपूर्ण मनोज्ञ छवि का दर्शन कर सुरराज ने सहस्त्र नेत्र बनाकर अपने आश्चर्य चकित अन्तःकरण को तृप्त करने का प्रयत्न किया, किन्तु फिर भी वह आश्चर्य एवं श्रानन्द के सिन्धु में श्राकण्ठ निमग्न रह आया । जिस समय सुरराज ने जिनराज को गोद में लिया, उस समय जय जयकार के ऊच्च स्वर से दशों दिशाएं पूर्ण हो रही थीं । इन्द्र ने प्रभु की स्तुति करते हुये कहा -- त्वदेव जगतां ज्योतिस्त्वं देव जगतां गुरुः । त्वं देव जगतां धाता त्वं देव जगतां पतिः ॥ १५८०॥ हे भगवन् ! आप विश्वज्योति स्वरूप हो । जगत् के गुरु हो । त्रिभुवन को मोक्ष मार्ग प्रदर्शन करने वाले विधाता हो । हे देव ! श्राप समस्त जगत् के नाथ हो । प्रश्न- भगवान् को पांडुक शिला की ओर कैसे ले आते हैं ? उत्तर-- पाण्डुक शिला को ओर प्रस्थान - भगवान् को अपनी गोद में लेकर सुरराज ऐरावत पर विराजमान हुये । उस समय ऐसा दिखता था मानो निषध पर्वत के अंक में बालसूर्य शोभायमान हो रहा हो । उस परम दृष्य की क्षण भर अपने मन में कल्पना करने से भी हृदय में एक मधुर रस की धारा प्रवाहित हुये बिना न रहेगी । fter की गोद में त्रिलोकीनाथ हैं । ईशान स्वर्ग का सुरेन्द्र धवल वर्ष का छत्र लगाएं हैं । सनत्कुमार तथा महेंद्र नामक इन्द्र युगल देवाधिदेव के ऊपर चामर दुरा रहे हैं । उस लोकोत्तर दृश्य की कल्पना भी जब हृदय में पीयूष धारा प्रवाहित करती है, तब उस समय के दृश्य के साक्षात् दर्शन से जीवों की क्या मनः स्थिति हुई होगी। जिनसेनाचार्य कहते हैं- वृष्ट्वा तदानों भूति कुदृष्टिमरुतोऽपुरे । सन्मार्गरुचिमानुः इन्द्रप्राभाव्य मास्थिताः ॥ १८१
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy