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अध्याय : आठवां ]
[ ६४७ में निमग्न करके उनकी गोद में मायामयी शिश् को रखकर जितेन्द्र देव को मेरु पर्वत पर अभिषेक के लिये लायो ।
शची ने सुरराज़ की आज्ञा का पालन करते हुये उस नरेन्द्र भवन के अन्तःपुर में प्रवेश किया और माता मरुदेवी के अंचल के भीतर बैठे हुये बाल स्वरूप जिनेन्द्र का दर्शन किया। उस समय इन्द्राणी के हृदय में ऐसा प्रानन्द पाया कि उसका वर्णन साक्षात् भारती (सरस्वती) के द्वारा भी शायद ही सम्भव हो । त्रिलोकी नाथ की मुखचन्द्रिका दर्शन कर शची के. नयन चकोर पुलकित हो रहे थे। हृदय कल्पनातीत प्रानन्द सिधु में निमग्न हो रहा था । शची ने बालजिनेन्द्र सहित माता को बड़े प्रेम, ममता, श्रद्धा तथा भक्ति पूर्वक देखा । अनेक बार भगवान और जिन माता की प्रदक्षिणा के पश्चात् त्रिभुवन के नाथ भगवान को बड़ी भक्ति से प्रणाम किया तथा जिनमाता की स्तुति करते हुये कहा :- . . .
त्यमम्ब भुवनाम्बासि कल्याणीत्वं सुमंगला । महादेवी स्वमेवाद्यत्वं सपुण्या यशस्विनी ॥१५७५७.'
हे माला ! तुम तो तीनो लोकों का कल्याण करने वाली विश्वजननी हो । कल्याणकारिणी हो । सुमंगला हो । महादेवी हो । यशस्विनी और पुण्यवती हो।
इस प्रकार जिनेन्द्र जननी के प्रति अपना उज्जवल प्रेम प्रदर्शित करते हुये माता को निद्रा निमग्न कर तथा उसकी गोद में मायामयी शिशु को रख कर शची ने जगद्गुरु को अपने हाथ में उठाया और परमानन्द को प्राप्त किया। जिनसेन स्वामी कहते हैं
तद्गात्र-स्पर्शमासाद्य सुदुर्लभमसौतदा। मन्येत्रिभुवनश्वयं स्वसाकृतमिवाखिलम् ॥१५७६।।
उस समय अत्यन्त दुर्लभ बालजिनेन्द्र के शरीर का स्पर्श कर शची को ऐसा प्रतीत हुआ मानों तीन लोक का ऐश्वर्य ही उसने अपने अधीन कर लिया हो । इन्द्राणी ने प्रभु को बड़े सादरपूर्वक लेकर इन्द्र को देने के लिये प्रसव मन्दिर के बाहर पैर रखे, उस समय भगवान के प्रागे अष्ट मंगल द्रव्य अर्थात् छत्र, चामर, ध्वजा, कलश, सुप्रतिष्टक (लोना), भारी, दर्पण तथा पंखा धारण करने वाली दिककुमारी देवियाँ भगवान् की उत्तम ऋद्धियों के समान गमन करती हुई प्रतीत होती थीं । इसके अमन्तर इन्द्राणी ने देवाधिदेव को सुरराज के करतल में सौंपा । कहा भी है