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[ गो. प्र. चिन्तामरिण ५३८५६०८ देवांगनाएँ थीं । यही बात मुनिसुव्रत काव्य में इस प्रकार लिखी है :
द्वात्रिंशदास्यानि मुखेऽष्टता दंतेब्धिरम्धौ बिसिनी बिसिन्यां । द्वात्रिशदजानि छलानि चाब्जे द्वात्रिशदिद्विरदस्यरेजुः ॥१५७५॥ ..
ऐरावत का स्वरूप चिंतन करते ही बुद्धि जीवी मनुष्य में अद्भुत रस उत्पन्न हुये बिना न रहेगा । यदि वह सोचे कि स्थल रूपधारी छोटे दर्पण में बड़े-बड़े पदार्थ प्रतिबिंब रूप से अपना सुक्ष्मं परिणामन करके प्रतिबिम्बित होते हैं । छोटे से मेरा द्वारा बड़ी वस्तुओं का चित्र खींचा जाता हैं, तब इससे भी सूक्ष्म वैक्रियिक जक्ति धारी देवे रचित. ऐरावत हाथी का सद्भाव पूर्णतया समीक्षक बुद्धि के अनुरूप है। सम्यग्दृष्टि जीव की श्रद्धा पदाथों की. अचित्य शक्ति को ध्यान में रखकर ऐसी बातों को शिरोधार्य करने में संकोच का अनुभव नहीं करती है । सर्वज्ञ वीतराग हितोपदेशी भगवान के द्वारा कथित तत्व होने से ऐसी बातें सम्बकत्वी सहज ही स्वीकार करता है । इन बातों को काल्पनिक समझने वाला आगम की विविध शाखाओं का मार्मिक ज्ञाता होते भी सम्यकत्व शून्य ही स्वीकार करना होगा, कारण सम्यकत्वी जीव प्रवचन में कथित समस्त तत्वों को प्रमाणिक मानता है। एक भी बात को न मानने वाला प्रागम में मिथ्यात्वोदय के प्राधीन माना जाता है । प्रश्न :---इन्होंने वैभव के साथ अयोध्या नगरी में किस प्रकार प्रवेश
किया था? उत्तर :--सौंधर्मेन्द्र का अयोध्या नगरी में प्रवेश-सोलह स्वर्ग तक के समस्त देव, देवांगना तथा भवनत्रिक के देवताओं का समुदाय महान् पुण्यात्मा सौधर्मेन्द्र के नेतृत्व में प्राकाश मार्ग से श्रेष्ठ वैभव, प्रानन्द, प्रसन्नता तथा अमर्यादित उल्लास के साथ अयोध्या की ओर बढ़ रहा था। जिनसेन स्वामी ने लिखा है :
तेषामापतता यानविमानैराततं नमः । विष्टि पटलेभ्योऽन्यत्र स्वर्गान्तरमिवासजत् ।।१५७६।।
• उन पाते हुए, देवों के विमान और वाहनों से व्याप्त हुमा प्राकाश ऐसा प्रतीत होता था, मानों सठ पटल वाले स्वर्ग को छोड़कर अन्य स्वर्ग का निर्माण हुपा हो । महाराज. नाभिराज के राजभवन का प्रांगण सुरेन्द्रों के समुदाय से भर गया था। देवों की सेनाएँ अयोध्या. पुरी को घेर कर अस्थित हो गई थी । इन्द्र ने शंची को आदेश दिया कि तुम प्रसव मन्दिर में प्रवेश करो। माता को सुखमयी निद्रा
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