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[ गो. प्र. चिन्तामरि "सम्यग्दर्शन से शुद्ध मनुष्य व्रत रहित होने पर भी नरक और तिर्य गति, नपुंसक और स्त्री पर्याय, नीच कुल, विकलाङगता, अल्पायु और दरिद्रता के प्राप्त नहीं होते।"
दुर्गतावायुषो बधे सम्यक्त्वं यस्य जायते । मतिच्छेदो न तस्यास्ति तथाप्यल्पतरा स्थितिः ।।२।।
यदि सम्यग्दर्शन प्राप्त होने के पहले किसी मनुष्य ने नरक आयु का बन् कर लिया है, तो वह पहले नरक से नीचे नहीं जाता है। यदि तिर्यञ्च और मनच का बन्ध कर लिया है, तो भोग भूमि का तिर्यञ्च और मनुष्यं होता है और या देवायु का बन्ध किया है, तो वैमानिक देव ही होता है, भवन त्रिकों में उत्पन्न नहुँ होता। सम्यग्दर्शन के काल में यदि तिर्यञ्च और मनुष्य का प्रायु बन्ध होता है, नियम से देवायु का ही बन्ध होता है और नारकी तथा देव के नियम से मनुष्यापू. के ही वन्ध होता है।
हेछिमछापुढवीणं जोइसिवरण भए सम्वइत्थीए । पुरिणदरे गहि सम्भो । सासणो रणारयापुण्णरे ।।१२७जी.का.२६॥
सम्यग्दृष्टि जीव किसी भी गति की स्त्री पर्याय को प्राप्त नहीं होता मनुष्य और तिर्यञ्च गति में नपुंसक भी नहीं होता।
सम्यग्दर्शन में पवित्र मनुष्य, पोज, तेज, वीर्य, यश, वृद्धि, विजय श्री वैभव से सहित उच्च कुलीन, महान वर्थ से सहित श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं।
सम्यग्दृष्टि मनुष्य यादि स्वर्ग जाते हैं, तो वहाँ अणिमा अदि आठ गुणेकी पुष्टि से संतुष्ट तथा सातिशय शोभा से युक्त होते हुए देवाग्ङनाओं के समूह । चिर काल तक क्रीड़ा करते हैं । .
सम्यग्दृष्टि जीव स्वर्ग से प्राकर नौ निधि और चौदह रस्ना के स्वामी समस्त भूमि के अधिपति तथा मुकुटबद्ध राजारों के द्वारा वन्दित चरण होते हो। सुदर्शन चक्र को बताने में समर्थ होते हैं-चक्रवर्ती होते हैं। ...
"सम्यग्दर्शन के द्वारा पदों का ठीक-ठीक निश्चय करने वाले पुरुष अमरे असुरेन्द्र, नरेन्द्र तथा मुनीन्द्रों के द्वारा स्तुनचरण होते हुए लोक के शरण्यम तीर्थकर होते हैं।