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अध्याय : दूसरा ]
[ ८७ सम्यदृष्टि जीव अन्त में उस मोक्ष को प्राप्त होते हैं, जो जरा से रहित है, रोग रहित हैं, जहाँ सुख और विद्या का वैभव चरम सीमा को प्राप्त है तथा जो कर्म मल से रहित है।
जिनेन्द्र भगवान में भक्ति रखने वाला-सम्यग्दृष्टि भव्य मनुष्य, अपरिमित महिमा से युक्त इन्द्र समूह की महिमा को, राजाओं के मस्तक से पूजनीय चक्रवर्ती के से चक्ररत्न को और समस्त लोक को नीचा करने वाले धर्मेन्द्र चन-तीर्थकर के धर्मचक्र को प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त होता है । .
:-सम्यग्दर्शन और अनेकान्त क्या हैं ? उत्तर :--सम्यग्दर्शन और अनेकान्त :-पदार्थ द्रव्य पर्यायात्मक हैं । अतः उसका निरू
.. पण करने के लिए प्राचार्यों ने द्रव्याथिक नय और पर्यायाथिक नय इन दो . .. नयों को स्वीकृत किया है । द्रव्याथिक नय मुख्य रूप से द्रव्य का निरूपण
करता है और पयायाथिक नय मुख्य रूप से पर्याय को विषय करता है। अध्यात्मप्रधान ग्रंथों के निश्चयनय और व्यवहारनय की चर्चा पाती है। निश्चय नय गुण-गुणी के भेद से रहित तथा पर के संयोग से शून्य शुद्ध वस्तुतत्त्व को ग्रहण करता है और व्यवहार नय, गुण-गुणी के भेद रूप तथा पर के संयोग से उत्पन्न अशुद्धता से युक्त वस्तु तत्त्व का प्रतिपादन करता है । द्रव्याथिक और पर्यायार्थिक तथा निश्चय और व्यवहार नय के विषय परस्पर विरोधी है । द्रव्याथिक नय पदार्थ को नित्य तथा एक. कहता. है, तो पर्यायाथिक अनित्य तथा अनेक कहता है। निश्चयनय प्रात्मा को शुद्ध तथा अभेदरूप वर्णन करता है, तो व्यवहार नय अशुद्ध तथा भेद रूप बतलाता है । नयों के इस विरोध को दूर करने वाला अनेकान्त है । विवक्षावश परस्पर विरोधी धर्मों को गोगा मुख्य रूप से जो ग्रहण करना है, उसे अनेकान्त कहते हैं। सम्यग्दृष्टि मनुष्य इसी अनेकान्त का प्राश्रय लेकर.वस्तु स्वरूप को समझता है और पात्र की योग्यता देखकर दूसरों को समझाता है । सम्यग्दर्शन के होते ही इस जीव को एकान्त दृष्टि समाप्त हो जाती है । क्योंकि निश्चय और व्यवहार के वास्तविक स्वरूप को समझकर दोनों नयों के विषय में मध्यस्थता को ग्रहण करने वाला मनुष्य ही जिनागम में प्रतिपादित वस्तु स्वरूप को अच्छी तरह समझ सकता है। सम्यग्दृष्टि जीव
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