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________________ SHA- 1. SEARCH 12 :18. "..3 [ गो. प्र. चिन्तामशिन निश्चयाभास, व्यवहाराभास और उभयाभास को समझकर उन्हें छोड़ता तथा वास्तविक वस्तु स्वरूप को ग्रहण कर कल्याणपथ में प्रवर्तता है। प्रश्न :--सम्यग्दृष्टि को अन्तर्दृष्टि कैसी है ? उत्तर :- सम्यग्दृष्टि की अतन्दं प्टि-श्री अमृतचन्द्र स्वामी ने कहा है-"सम्यादा भवति नियतं ज्ञान-वैराग्यशक्तिः" सम्यग्दृष्टि जीव के नियम से ज्ञान प्रो वैराग्य की शक्ति प्रगःो जाती है, इमलिए हर संभ कार्य करता हो भी अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी रखता है। "मैं अनन्तज्ञान का पुञ्ज, शुद्ध रागादि के विकार से रहित चेतन द्रव्य हूँ, मुझ में अन्य द्रव्य नहीं है । अन्य प्रात्मा के अस्तित्व में दिखने वाले रागादिक. भाव मेरे स्वभाव नही। हैं ।" इस प्रकार स्वरूप की और दृष्टि रखने से सम्यग्दष्टि जीव, अनन्त । संसार के कारणभूतं बन्ध से बच जाता है। प्रशंम--संबेगादि गुणों के प्रगट हो जाने से उसके कषाय का वेग ईधन रहित अग्नि के समान उत्तरोत्तर । घटता जाता है। यहाँ तक कि बुराई होने पर उसकी कषाय का संस्कार छह महीने से ज्यादा नहीं चलता। यदि छह माह से अधिक कषाय का संस्कार किसी मनुष्य का चलता है, तो उसके अनन्तानुबन्धी काय का उदयः । है और उसके रहते हुए वह नियम से मिश्यादृष्टि है। अंतोमुहत्त पक्खो छम्मासं संख संख पंतभवं । संजलबमादियारणं वासणकालो दुणिय भेग ॥यो.क.कां.।। ऐसा समझना चाहिये । सम्यग्दृष्टि जीव अपनी वैराग्य शक्ति के कारमा । सांसारिक कार्य करता हुग्रा भी जल में रहने वाले कमलपत्र के समान निलिप्त रहता है। है । वह मिथ्यात्व, अन्याय और अभक्ष्य का त्यागी हो जाता है । भय, आशा, स्ना था लोभं के वशीभूत होकर कभी भी कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरुयों की उपासना नती करता। किसी पर स्वयं अाक्रमण नहीं करता। हाँ, किसी के द्वारा अपने उप प्राकभरा होने पर आत्मा रक्षा के लिए युद्ध आदि भी करता है। मांस-मदिरा आणि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं करता ।. लात्पर्य यह है कि सम्यकदष्टि की चालवाद ही बदल जाती है । me ANCE
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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