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PRAKAS
अध्याय तीसरा : सम्यग्ज्ञान
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HARIRIKE
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:.:... प्रश्न :-सम्याज्ञान का क्या स्वरूप है ?
... उत्तर :-मोक्षमार्ग में प्रयोजन भूत जीवाजीवादि सात तत्वों को संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय से रहित जानना सम्याज्ञान है। यह सम्यग्ज्ञान सभ्यग्दर्शन के साथ ही होता है-जिस प्रकार मेघपटल में दूर होने पर सूर्य का प्रताप और प्रकाश एक साथ प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार मिथ्यात्व' :का . यावरगा दूर होने पर
सम्यग्दर्शन और सम्यग्जान एक साथ प्रगट हो जाते हैं । यद्यपि ये दोनों एक साथ । प्रगट होते हैं, फिर भी दीपक और प्रकाश के सामान दोनों में कारण-कार्य भाव है । अर्थात सम्यग्दर्शन कारण है और सम्यग्ज्ञान कार्य है।
यहाँ प्रश्न उठता है, कि जब पदार्थ का सम्यग्ज्ञान होगा तभी तो श्रद्धा सम्यक् होकर सम्यग्दर्शन हो सकेगा, इसलिए सम्यग्ज्ञान को कारण और सम्यग्दर्शन को कार्य मानना चाहिये ? ... ... ... .......
उत्तर यह है कि सम्यग्दर्शन होने के पहले इतना ज्ञान तो होता ही है कि जिसके द्वारा तत्त्वस्वरूप का निर्णय किया जा सके, परन्तु उस ज्ञान में सम्यक्पद का .. व्यवहार तभी होता है, जब सम्यग्दर्शन हो जाता है 1 पिता और पुत्र साथ-ही-साथ उत्पन्न होते हैं, क्योंकि जब तक पुत्र नहीं हो जाता तब तक उस मनुष्य को पिला नहीं कहा जा सकता, पुत्र के होते ही पिता कहलाने लगता है। पुत्र होने के पहले वह मनुष्य तो था, पर पिता नहीं। इसी प्रकार सम्यग्दर्शन के होने के पहले ज्ञान तो रहता है, पर उसे सम्यग्नान नहीं कहा जा सकता। सम्यग्ज्ञान का व्यवहार सम्मादर्शन के होने पर ही होता है । जिस प्रकार पिता-पुत्र साथ-साथ होने पर भी पिता कारगण कहलाता है और पुत्र कार्य, उसी प्रकार साथ-साथ होने पर भी सम्यग्दर्शन कारण नीर सम्यग्जान कार्य कहलाता है ।
यह् सम्यग्ज्ञान मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल के भेद से पांच प्रकार का है। इनमें मति और श्रुत ज्ञान. परोक्ष ज्ञान कहलाते हैं, क्योंकि उनकी उत्पत्ति इन्द्रियादि पर पदार्थों की सहायता से होती है, और अवधि, सनःपर्यय तथा केवल ये तीन प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाते हैं, क्योंकि इनकी उत्पत्ति इन्द्रियादि पर पदार्थों
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