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________________ ६० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि को सहायता से न होकर स्वतः होती है। इनमें भी अवधि और मनः पर्ययज्ञानः एकदेश प्रत्यक्षज्ञान कहलाते हैं, क्योंकि सीमित क्षेत्र और सीमित पदार्थों को ही जानते हैं | परन्तु केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष कहलाता है, क्योंकि वह लोकालोक के समस्त पदार्थों को स्पष्ट जानता है । प्रश्न :- -- मतिज्ञान का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- - मतिज्ञान --जो पांच इन्द्रियों और मन की सहायता से पदार्थ को जानता है, वह मतिज्ञान कहलाता है। इसके मूल में अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार भेद होते हैं। ये चार भेद बहु आदि बारह प्रकार के पदार्थों के होते हैं. इसलिये बारह में चार का गुणा करने पर अड़तालीस भेद होते हैं । ये अड़तालीस भेद पांच इन्द्रियों और मन के द्वारा होते हैं । इसलिए अड़तालीस में छह का गुणा करने पर दो सौ अठासी भेद होते हैं । श्रवग्रह के व्यञ्जनावग्रह और अर्थावग्रह इस प्रकार दो भेद हैं । व्यञ्जनावग्रह अस्पष्ट पदार्थों का अवग्रह चक्षु और मन से नहीं होता, इसलिए बहु आदि बारह पदार्थों में चार का गुरणा करने पर उनके अड़तालीस भेद होते हैं । प्रर्थावग्रह के बहत्तर भेद दो सौ अठासी में व्यंजनावग्रह के अड़तासील भेद जोड़ देने से मतिज्ञान के कुल भेद ३३६ होते हैं । मति, स्मृति, संज्ञा, चिन्ता और बोध-आदि मतिज्ञान के ही विशिष्ट रूपान्तर हैं । धवला पुस्तक १३, पृष्ट २४०-२४१ पर मतिज्ञान के उत्तर भेदों की चर्चा करते हुए कहा गया है Pmer 'तं जहा ४, २४, २८, ३२ पदे पुम्वुप्पाइदे भंगे दोसु द्वारणेसु दुत्रिय छह बारसेहिय गुरिएय पुरात्तमवरिणय परिवाडीए दृइदे सुत्तपरू विदभंगपमाण होदि । च. एदं – ४, २४, २८, ३२, ४८ १४४, १६८, १०२२८८, ३३६, ३८४ । जत्तिया मदिरणाविधा तसिया चैव प्रभिविवोहियासावरणीयस्स पर्याsवियप्पा ति वतव्यं । इसका भावार्थ विशेषार्थ में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है- यहाँ मतिज्ञान के अवान्तर भेदों का विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। मूल में अवग्रह श्रवा और धारणा में चार भेद हैं। इन्हें पांच इन्द्रिय और मन से गुरित करने पर २४ भेद होते हैं । इनमें व्यञ्जनावग्रह के ४ भेद मिलाने पर २८ भेद होते हैं । २८ उत्तर भेद हैं, इसलिये इनमें अवग्रह श्रादि ४ मूल भंग मिलाने पर ३२ भेद होते
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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