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अध्याय : तोसरा 1
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1 ये तो इन्द्रियों और अवग्रह यादि की अलग-अलग विवक्षा से भेद हुए | अब जो बहु, बहुविध, विषि अनु प्रकार के पदार्थ तथा इनके प्रतिपक्षभूत इतर पदार्थों को मिलाकर बारह प्रकार के पदार्थ बतलाये हैं, उनसे ग्रलगउक्त विकल्पों को गुपित किया जाता है, जो सूत्रोक्त मतिज्ञान के सभी विकल्प उत्पन्न होते हैं । यथा --- ४x६ = २४, २४० ६=१४४, २६४६=१५६, ४×१२=४८, २४१२-२८५, २८.१२३३६ ३२x१२ ३८४ । उक्त सन्दर्भानुसार विवक्षावश मतिज्ञान के ३८४ भेद भी होते हैं । बवला के इसी संदर्भ में अवग्रह के अवग्रह, ग्रवधान, सान, अवलम्बना और मेधा । ईहा केईहा, उहा, अपोहा, मार्गरणा, गवेषणा और मीमांसा, अवाय के प्रवाय, व्यवसाय, बुद्धि, विज्ञप्ति, प्रामुण्डा और प्रत्यामुण्डा तथा धारणा के - धरणी, वारणा, स्थापना, कोष्टा और प्रतिष्ठा ये एकार्थक पर्यायवाची नाम दिये हैं । इनका शब्दार्थ धवला से ही जात करना चाहिये ।
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प्रश्न :-- श्रुतज्ञान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- श्रुतज्ञान -- मतिज्ञान के बाद अस्पष्ट अर्थ की तर्करणाको लिये हुये हुए जो ज्ञान होता है, उसे श्रुतज्ञान कहते हैं, यह श्रुतज्ञान पर्याय, पर्याय समास आदि बीस भेदों में क्रम से वृद्धि को प्राप्त होता है। दूसरी शैली से श्रुतज्ञान के अंगबाह्य और अंगप्रविष्ट की अपेक्षा दो भेद होते हैं । इनमें अंगबाह्य के अनेक भेद हैं और अंगप्रविष्ट के १. ग्राचारांग, २. सूत्र कृलांग, ३. स्थानांग, ४. समवायांग, ५. व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग, ६. धर्मकथांग, ७. उपासकाध्ययनांग, ८. ग्रन्तकृदृशांग, ६. अनुत्तरोपपादिक दिशांग १०. प्रश्न व्याकरणग, ११. विपाक सूत्रांग और १२. दृष्टिवादांग में बारह भेद हैं । इनमें बारहवें दृष्टिवाद अंग के १. परिकर्म, २. सूत्र, ३. प्रथमानुयोग, ४. पूर्वगत और ५. चूलिका इस प्रकार पांच भेद हैं। परिकर्म के २. चन्द्र प्रज्ञप्ति, २. सूर्य प्रज्ञप्ति, ३. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, ४. द्वीपसागर प्रज्ञप्ति और ५. व्याख्याप्रज्ञप्ति इस प्रकार पांच भेद हैं । पूर्वगत के १. उत्पाद पूर्व २. प्राणी पूर्व, ३. वीर्यानुवाद पूर्व ४. ग्रस्तिनास्ति पूर्व, ५. ज्ञानप्रवाद पूर्व ६. सत्यप्रवादपूर्व ७. आत्मप्रवाद पूर्व, • कर्मप्रचाद पूर्व प्रत्याख्यान पूर्व १० विद्यानुवाद पूर्व ११. कल्याणवाद पूर्व, १२. प्राशवाद पूर्व १३ क्रियाविशाल पूर्व और १४. त्रिलोक विन्दुसार ये 'चौदह भेद हैं । चूलिका के १. जलगता, २. स्थलगता, ३. मायागता. ४. आकाशगता