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________________ KASAN ..... ...... .... ".... .... १२ ] गो. प्र. चिन्तामणि और ५. रूपगता इस प्रकार पाँच भेद है। सूत्र और प्रथमानुयोग के एक-एक ही भेद हैं। अंगबाह्य के १. सामायिक, २. चतुविशतिस्तव, ३. बन्दना, ४. प्रतिक्रमण, . ५. वैनयिक, ६. कृतिकर्म, दशवकालिक, ८. उत्तराध्ययन, . ६. कल्पव्यवहार, १०, कल्पाकल्प, ११. महाकल्प, १२. पुण्डरीक, १३. महापुण्डरीक और १४. निषिद्धक ये । चौदह भेद हैं। . . . . . इन सबके वर्णनीय विपय तथा पद आदि की संख्या के लिये जीवकाण्ड की श्रुतज्ञान मार्गरणा देखना चाहिये। ... यह श्रुतज्ञान स्वार्थ और पदार्थ की अपेक्षा दो प्रकार का है । उनमें परार्थ श्र तज्ञान द्रव्याश्चिक, पर्यायाधिक, नैगम, संग्रह, व्यवहार, · ऋजुसूच, शब्द, समभिरूढ. और एवंभूतनय, अर्थनय, शब्दनय, निश्चयनय तथा व्यवहारनय आदि भेदों को लिये। हुए अनेक नय रूप है। . . . .. समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में सम्यग्ज्ञान का अधिक विस्तार नकार मात्र थ तज्ञान को मुख्यता देते हुए समस्त शास्त्रों को १. प्रथमानुयोग, : २. करणानुयोग, ३ चरणानुयोग और ४. द्रव्यानुयोग के भेद से चार अनुयोगों में विभक्त किया है । मनुष्य इन चार अनुयोगों · का अभ्यास कर अपने शुतज्ञान रूप सम्यग्ज्ञान को पुष्ट कर सकता है ! अवधिज्ञान, मनः पर्ययज्ञान और केवलज्ञान तो तत्तत् प्राचरणों का अभाव होने पर स्वयं प्रगट हो जाते हैं, उनमे मनुष्य का पुरुषार्थ : नहीं चलता है, सिर्फ अनुयोगात्मक श्रुतजान में पुस्पार्थ चलता है। अतः अालस्य ।। • छोड़कर चारों अनुयोगों का अभ्यास करना चाहिये । .. ..... . प्रश्न :—अवधिज्ञान का क्या स्वरूप है ?. : उत्तर :- अवधिज्ञान--पर पदार्थों की सहायता के विना द्रव्य, क्षेत्र, कालः . भाब की मर्यादा को लिये हुए रूपी पदार्थों को जो स्पष्ट जाने उसे अवधिज्ञान कहते है। हैं। यह अवधिज्ञान, भवप्रत्यय और गणप्रत्यय के भेद से दो प्रकार का होता है। ... भवप्राय नाम का अवविज्ञान देव और नारकियों के होता है, मनुष्यों में तीर्थकरों के भी होता है। सर्वांग से होता है । गुग्ग प्रत्यय आवधिज्ञान पर्याप्त मनुष्य संज्ञी और .. पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तक तिर्यञ्चों के होता है । यह नाभि के ऊपर स्थित शंखादि चिन्हों से होता है । इसके अनुगामी, अननुगामी; वर्धमान हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित । इस प्रकार छ: भेद होते हैं । इनकी परिभाषाएँ नामों से स्पष्ट हैं। भयप्रत्यय और ...... ... । AR PUTRAININMEAmarana
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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