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अध्याय : तीसस ]
गणप्रत्यय-~-दोनों ही अवधिज्ञानों में अन्तरंग कारण अवधिज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम हैं । इनके सिवाय अवधिज्ञान के देशावधि, परमावधि और सर्वावधि से तीन भेद और होते हैं । अपर कहा हुआ भवप्रत्यय अवधिज्ञान देशावधि के 'अन्तर्गत होता है । देशावधि चारों गतियों में हो सकता है, परन्तु परमावधि और सर्वावधि चरम शरीरी मुनियों के ही होते हैं। देशावधिज्ञान प्रतिपाती हैं, शेष दो ज्ञान अप्रतिपाती हैं। इन्हें धारण करने वाले मुनि मिथ्यात्व और असंयम अवस्था को प्राप्त . नहीं होते। इन तीनों अवधिज्ञानों का द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट विषय यागम से जानना चाहिये । गुणप्रत्यय का दूसरा नाम क्षयोपशम .. निमित्तक भी है। .
मति, अत और अवधि ये तीन ज्ञान यदि सम्यग्दर्शन के साथ होते हैं, तो सम्यग्ज्ञान कहलाते हैं । . .
प्रश्न :-.-भानः पर्ययज्ञान का क्या स्वरूप हैं ? .. .... उत्तर :- मनः पर्ययज्ञान-इन्द्रियादिक की सहायता के बिना दूसरे के मन में स्थित रूपी पदार्थों को जो द्रव्य क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा लिये हुए स्पष्ट जानता है, उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान मुनियों के ही होता है, गृहस्थों के नहीं इसके दो भेद हैं-- एक ऋजुमति और विपुलमति । ऋजुमति, सरल मन-वचन-काय से चिन्तित, पर के मन में स्थित, रूपी पदार्थ को जानता है और विपुलमति सरल तथा कुटिल रूप मन-वचन-काय से चिन्तित पर के मन में स्थित रूपी पदार्थ को जानता है । ऋजुमति की अपेक्षा विपुलमति में विशुद्धि अधिक होती है । ऋजुमति सामान्य मुनियों को भी हो जाता है, परन्तु विपुल मति उन्हीं मुनियों के होता है, जो उपरितन गुणस्थानों से गिर कर नीचे नहीं पाते । तथा सद्भव मोक्षगागी होते हैं। इसके दोनों भेदों का द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा अघन्य और उत्कृष्ट विषय प्रागम, ग्रन्थों से जानना चाहिो । मनःपर्ययज्ञान ईहा-मतिज्ञानपूर्वक होता है । इसका अन्तरंग . कारंग मनःपर्ययज्ञान का क्षयोपशम है।
प्रश्न :-केवलज्ञान का क्या स्वरूप हैं ?.
उत्तर :--केवलज्ञान-जो बाह्य पदार्थों की सहायता के विना लोकालोक के समस्त पदार्थों को उनकी त्रिकाल सम्बन्धी अनन्त पईयों के साथ स्पष्ट जानता है, उसे केवलज्ञान कहते हैं। इसको उत्पत्ति मोहनीय तथा शेष तीन वातिया कर्मों के
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SatsANSWAROR ISRORAN