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[ · गो. प्र. चिन्तामणि क्षय होने पर तेरह गुणस्थान में होती है। ग्रह क्षायिक ज्ञान कहलाता है और तद्भव मोक्षगामी मनुष्यों के ही होता है । इसे सकल प्रत्यक्ष भी कहते है । यह ज्ञानगुण की सैवत्कृष्ट पर्याय है तथा सादि अनन्त है, इसे प्राप्त कर मनुष्य देशोनकोटि वर्ष पूर्व के भीतर नियम से मोक्ष चला जाता है । यह ज्ञान इच्छा के बिना ही पदार्थों को जानता है।
अप्पा झाययो पिच्चं पाऊणं गुरुपसाएग गुरु के प्रसाद से आत्मा को जानकर नित्य उसका ध्यान करना चाहिए।
-मोक्ष पाहुड, गाथा ३० परदव्वादो दुग्गई सद्दन्वादो सुग्गई । पर द्रव्य के प्राश्रय से दुर्गति (चतुर्गति) तथा स्व द्रव्य से सुगति (मोक्ष) होती है । ......
- मोक्ष पाहुर, गाथा १६
सगदध्वमुवादेयं । अपना आत्मा उपादेय है। ..
—नियममार, गाथा ५० अप्पा सपरपयासो होदि. प्रात्मा स्व-पर प्रकाशक होता है ।
-नियमसार, गाथा १३१ सम्मं मे सव्वभूदेसु बेरं मज्झ रण केरगति । सभी जीवों के प्रति मेरी समता है, मेरा किसी से वैर नहीं है ।
" -नियमसार, गाथा १०६ .
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