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________________ -18 [ · गो. प्र. चिन्तामणि क्षय होने पर तेरह गुणस्थान में होती है। ग्रह क्षायिक ज्ञान कहलाता है और तद्भव मोक्षगामी मनुष्यों के ही होता है । इसे सकल प्रत्यक्ष भी कहते है । यह ज्ञानगुण की सैवत्कृष्ट पर्याय है तथा सादि अनन्त है, इसे प्राप्त कर मनुष्य देशोनकोटि वर्ष पूर्व के भीतर नियम से मोक्ष चला जाता है । यह ज्ञान इच्छा के बिना ही पदार्थों को जानता है। अप्पा झाययो पिच्चं पाऊणं गुरुपसाएग गुरु के प्रसाद से आत्मा को जानकर नित्य उसका ध्यान करना चाहिए। -मोक्ष पाहुड, गाथा ३० परदव्वादो दुग्गई सद्दन्वादो सुग्गई । पर द्रव्य के प्राश्रय से दुर्गति (चतुर्गति) तथा स्व द्रव्य से सुगति (मोक्ष) होती है । ...... - मोक्ष पाहुर, गाथा १६ सगदध्वमुवादेयं । अपना आत्मा उपादेय है। .. —नियममार, गाथा ५० अप्पा सपरपयासो होदि. प्रात्मा स्व-पर प्रकाशक होता है । -नियमसार, गाथा १३१ सम्मं मे सव्वभूदेसु बेरं मज्झ रण केरगति । सभी जीवों के प्रति मेरी समता है, मेरा किसी से वैर नहीं है । " -नियमसार, गाथा १०६ . eisasti NSAR PROMOTION avlbasis . DORE MARRIORSRONOMINABRAware
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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