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अध्याय : चौथा प्रसारण-नय ..
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प्रश्न :--प्रमाण और नय का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :-प्रमागा और नय-तत्त्वार्थ सूत्रकार ने जीवाजीवादि तत्त्वों तथा सम्यग्दर्शनादि
गुणों के जानने के उपायों की चर्चा करते हुए 'प्रमाण नयैरधिगमः' इस सूत्र द्वारा प्रमाण और नयों का उल्लेख किया है । जो वस्तु में रहने वाले अस्ति-नास्ति, एक-अनेक, भेद-अभेद आदि समस्त धर्मों को एक साथ ग्रहण करता है, उसे प्रमाण कहते हैं, और जो उपर्युक्त धर्मों को गौरग-मुख्य करता हुमा क्रम से ग्रहण करता है, उसे नय कहते हैं 1 प्रमारण के प्रत्यक्ष ।
और परोक्ष की अपेक्षा दो भेद हैं। प्रत्यक्ष भी सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष और परमार्थिक प्रत्यक्ष के भेद से दो प्रकार का है । अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान ये दो ज्ञान एकदेश प्रत्यक्ष कहलाते हैं और केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष
कहलाता है। उपरोक्त सर्व प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। प्रश्न :-परोक्षप्रमारस के कितने भेद हैं ? उत्तर :-परोक्षप्रमाण के पांच भेद होते हैं । स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान और
आगम । प्रश्न : स्मृति किसको कहते हैं ? . . . . . . . . . . उत्तर :...पहले ज्ञात या दृष्ट पदार्थ के याद (स्मरण) को स्मृतिज्ञान कहते हैं। प्रश्न :---प्रत्यभिज्ञान किसको कहते हैं ? उत्तर :--स्मृति और प्रत्यक्ष के विषयभूत पदार्थों के जोड़रूप ज्ञान को प्रत्यभिज्ञान
कहते हैं । जैसे यह वहीं मनुष्य है, जिसे कल देखा था। .. प्रश्न :-प्रत्यभिज्ञान के कितने भेद हैं ? उत्तर :-एकत्व प्रत्यभिज्ञान, सादृश्य प्रत्यभिज्ञान आदि अनेक भेद हैं । . प्रश्न :---एकत्व प्रत्यभिज्ञान किसको कहते हैं ?.. उत्तर :- स्मृति और प्रत्यक्ष के विषय भूत पदार्थ में एकता दिखाते हुये जोडरूप ज्ञान ...
को एकत्व प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । जैसे यह वही मनुष्य है, कल देखा था ।
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