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________________ [ = 2 चारों कषायों का उदय युगपत् रहता है । मिथ्यादृष्टि के कषाय का इतना मन्द उदय हो सकता है कि उस काल में शुक्ल लेश्या हो जावे और असंयत सम्यग्दृष्टि के इतनी तीव्र कषाय हो सकती है कि इस काल में कृष्ण लेश्या हो जाये जिसका श्रनन्त अर्थात् मिध्यात्व के साथ अनुबन्ध-गठबन्धन हो, वह अनन्तानुबन्धी है । जो एकदेश चारित्र का घात करे, वह अप्रत्याख्यानावरण हैं, जो सकल चारित्र का घात करे, वह प्रत्याख्यानावरण है और जो यथाख्यात चारित्र का घात करें, वह संज्वलन है । असंत सम्यग्दृष्टि के अनन्तानुबन्ध का अभाव होने से यद्यपि कषाय की मन्दता होती है, . परन्तु ऐसी मन्दता नहीं होती । जिससे चारित्र नाम प्राप्त कर सके । कषाय के असंख्यात लोक प्रमाण स्थान हैं, उनमें सर्वत्र पूर्व की अपेक्षा उत्तरोत्तर मन्दता पायी जाती है, परन्तु उन स्थानों में व्यवहार की अपेक्षा तीन मर्यादाएँ की गई हैं --- १. प्रारम्भ से लेकर चतुर्थं गुणास्थान तक के कपाय स्थान असंयम नाम से, २. पञ्चम गुणस्थान के कषाय स्थान देशचारित्र के नाम से और ३. षष्टम गुणस्थानों के कषाय स्थान सकल चारित्र के नाम से कहे जाते हैं । अध्याय: दूसरा ] प्रश्न : - सम्यग्दर्शन की महीमा क्या है ? उत्तर :- सम्यग्दर्शन की महीमा - सम्यग्दर्शन की महिमा बतलाते हुए समन्तभद्र स्वामी ने कहा है- रत्नकरण्ड श्रावकाचार ३१-४१ तक कि ज्ञान और चारित्र की अपेक्षा सम्यग्दर्शन श्रेष्ठता को प्राप्त होता है, इसलिये मोक्ष मार्ग में उसे कर्णधार - सेवटिया कहते हैं । जिस प्रकार बीज के अभाव में वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल की प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन के प्रभाव में सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल की प्राप्ति नहीं होती । 'निर्मोह - मिथ्यात्व से रहित - सम्यग्दृष्टि गृहस्थ जो मोक्षमार्ग में स्थित है, परन्तु मोहवान् मिथ्यादृष्टि मुनि मोक्षमार्ग में स्थित नहीं है । मोही मुनि की अपेक्षा मोह रहित गृहस्थ श्रेष्ठ है । ॐ तीनों कालों और तीनों लोकों में सम्यग्दर्शन के समान अन्य कोई वस्तु देह वारियों के लिये कल्याण रूप और मिथ्यात्व के समान ग्रकल्याण रूप नहीं है । * 22692251
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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