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[ गो. प्र. चिन्तामणि
उपशम विधान से . उपशम होता है, उसे प्रशस्त उपशम कहते हैं। और जो उदय का अभाव है, उसे अप्रशस्त उपशम कहते हैं। इनमें अनन्तानुबन्धी का तो प्रशस्त उपशम होता नहीं है, मोह की अन्य प्रकृतियों का होता है इसका, अप्रशस्त उपशम होता है । तीन करग कर अनन्तानुबन्धी के परमाणुओं को जो अन्य चारित्र मोहनीय की प्रकृति रूप परिणमाया जाता है, उसे विसंयोजन कहते हैं । प्रथमोपशम सम्यक्त्व में अनन्तानुबन्धी का अप्रशस्त उपशम ही होता है । द्वितीयो-.. पशम सम्यक्त्व की प्राप्ति में अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना नियम से होती है, ऐसा किन्हीं प्राचार्यों का मत है और किन्ही प्राचार्यों का मत है कि विसंयोजना का नियम नहीं है । क्षायिक सम्यक्त्व में नियम पूर्वक विसयोजना होती है। जिस उपयम और क्षायोपणम सम्यग्दृष्टि के विसंयोजना के द्वारा अनन्तानुबन्धी की सत्ता का नाश होता है, वह सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट होकर मिथ्यात्व में आने पर अनन्तानुबन्धी का जब नवीन बन्ध करता है तभी उसकी सत्ता होती है ।
यहीं कोई प्रश्न कर सकता है कि जब अनन्तानुबन्धी चारिश मोहनीय की. प्रकृति है, तब उसके द्वारा चारित्र का ही बात होना चाहिये, सम्बग्दर्शन का घात उसके द्वारा क्यों होता है ? इसका उत्तर यह है कि अनन्तानुबन्त्री के उदय से क्रोधादिक रूप परिणाम होते हैं, अतत्त्व श्रद्धान नहीं होता, इसलिये परमार्थ से अनन्तानुवन्धी के उदय में होने वाले क्रोधादिक के काल में सम्यग्नर्शन नहीं होता, इस-: लिये उपचार से उसे भी सम्यग्दर्शन का घातक कहा है। जैसे असपना का घातक तो स्थावर नाम कर्म का उदय है, परन्तु जिसके एकोन्द्रिय जातिनाम कर्म का उदय होता है, उसके असपना नहीं हो सकता, इसलिये उपचार से एकेन्द्रिय जातिनाम कर्म को असपना का वातक कहा जाता है। इसी दृष्टि से कहीं अनन्तानुबन्धी में दो. प्रकार की शक्तियाँ मान ली गई हैं-चारित्र को थालने की और सम्यग्दर्शन को
घातने की। . प्रश्न :- यदि अनन्तानुबन्धी चारिन मोहनीय की प्रकृति है, तो उसके उदय का
अभाव होने पर असंयत सम्यादृष्टि गुरगस्थान में भी कुछ चारित्र होना
चाहिये, उसे असंयत क्यों कहा जाता है ? उत्तर :--अनन्तानुबन्धी प्रादि भेद कषाय की तीवता या मन्दता की अपेक्षा नहीं है।
.. क्योंकि मिथ्यादृष्टि के तीन या मन्द पाय के होते हुए अनन्तानुबंधी आदि ।
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