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________________ [ ८३ . . RA SAvi अध्याय : दूसरा ] प्रश्न :--सम्यग्दर्शन को पालने वाली प्रकृतियों अन्तर्दशा कौन हैं ? उत्तर :- सम्यग्दर्शन को घातने वाली प्रकृतियों की अन्तर्दशा :--मुख्य रूप से सम्य.. ग्दर्शन को घातने वाली दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियाँ हैं-मिथ्यात्व, सम्यड निमम र बागमत्त प्रवाहि । इनमें मिथ्यात्व का अनुभाव सबसे अधिक है, उसके अनन्तवें भाग सम्य मिथ्यात्व का है और उसके अनन्तवें भाग सम्यक्त्व प्रकृति का है । इनमें सम्यक्त्व प्रकृति देशघाती है। इसके उदय से सम्यग्दर्शन का घात तो नहीं होता, किन्तु चल, मलिन और अगाढ़ दोष लगते हैं । यह नरहनतादिक मेरे हैं, ये दूसरे के हैं; इत्यादि भाव होने · को चल दोष कहते हैं—शंकादि दोपों का लगना मल दोष है और शान्ति नाथ शान्ति के कर्ता हैं-इत्यादि भाव का होना अगाढ़ दोष है । ये उदाहरण व्यवहार मात्र हैं, नियम रूप नहीं । परमार्थ से सम्यवत्व प्रकृति के उदय में कौनसे दोष लगते हैं, उन दोषों के समय प्रात्मा में कैसे भाव होते हैं, यह प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय है । इतना नियम रूप जानना चाहिये कि सम्यक्त्व प्रकृति के उदय में सम्यग्दर्शन निर्मल नहीं रहता । क्षायोपक्षमिक या वेदक . सम्यग्दर्शन में इस प्रकृति का उदय रहता है। क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन को धारण करने वाला कर्मभूमिज मनुष्य जव आयिक सम्यग्दर्शन के सम्मुख होता है, तव वह तीन करण करके मिथ्यात्व के परमाणुनों के सम्यङ मिथ्यात्व रूप या सम्यवत्व प्रकृति रूप परिणामाता है । उसके बाद सम्यङ मिथ्यात्व के परमाणुओं को सम्यक्त्व प्रकृति रूप परिणमाता है, पश्चात् सम्यक्त्व प्रकृति के निषेक उदय में आकर विरते हैं । यदि उसकी स्थिति आदि अधिक हों तो उन्हें स्थितिकाण्डादि घात के द्वारा घटाता है। जब उसकी स्थिति अन्तर्मुहर्त की रह जाती है, तब कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि कहलाता है, पश्चात् क्रम से इन निषेकों का नाश कर क्षायिक सम्यग्दृष्टि होता है । अनन्तानुबन्धी का प्रदेश क्षय नहीं होता, किन्तु अप्रत्याख्यानावरमादि रूप करके उसको सत्ता का नाश करता है । इस प्रकार इन सात प्रकृतियों को सर्वथा नष्ट कर क्षायिक सम्यग्दृष्टि होता है। :सम्यक्त्व होते समय अनन्तानुबन्धी की दो . अवस्थाएँ होती हैं-या तो ... अप्रशस्त उपशम होता है या विसंयोजन होता है । जो अपूर्वादि करण करने पर ह R
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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