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[ गो. प्र. चिन्तामणिः:
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उसका ज्ञान कभी तो आत्मा के विषय में ही उपर्युक होता है और कभी संसार के ग्रन्य घटपटादि पदार्थों में भी उपर्युक्त होता है । यतः सम्यग्दर्शन: और उपयोगात्मक स्वानुभूति की विषय व्याप्ति है । जहाँ स्वानुभूति होती हैं, वहाँ सम्यग्दर्शन अवश्य होता है, पर जहाँ सम्यग्दर्शन होता है, वहाँ स्वानुभूति भी होती है और घटपटादि अन्य पदार्थों की भी अनुभूति होती है । इतना अवश्य है कि लब्धि रूप स्वानुभूति सम्यग्दर्शन के साथ नियम से रहती है । यहाँ यह भी ध्यान में रखने योग्य है कि जीव को ज्ञान तो उसके क्षयोपशम के अनुसार स्व और पर की भूत, भविष्यत, वर्तमान की अनेक पर्यायों का हो सकता है, परन्तु उसे अनुभव उसकी वर्तमान पर्याय मात्र का ही होता है ।
सम्यक्त्वं वस्तुतः सूक्ष्ममस्ति वाचामगोचरम् ।
तस्माद् वक्तुम् च श्रोतु च नाधिकारी विधि क्रमात् ||४००॥
पंचाध्यायी उ० ||२६||
सम्यक्त्वं वस्तुतः स्पष्टं केवलज्ञान गोचरम् । गोचरं स्वावधिस्त्र मनः पर्यय ज्ञानयोर्द्धयोः ।। ३७५ ॥ २७ ॥
वस्तुतः सम्यग्दर्शन सूक्ष्म है और वचनों का विषय है; इसलिये कोई भी जीव विधिरूप से उसके कहने और सुनने का अधिकारी नहीं है अर्थात् यह कहने और सुनने को समर्थ नहीं है कि यह सम्यग्दृष्टि है अथवा इसे सम्यग्दर्शन है । किन्तु ज्ञान के माध्यम से ही उसकी सिद्धि होती है । यहाँ ज्ञान से स्वानुभूति रूप ज्ञान विवक्षित है 1 जिस जीव के यह स्वानुभूति होती है, उसे सम्यग्दर्शन अवश्य होता है, क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना स्वानुभूति नहीं होती है। प्रश्न उठता है कि जिस समय सम्यग्दृष्टि जीव विषयभोग या युद्धादि कार्यों में संलग्न होता है, उस समय उसका, सम्यग्दर्शन कहां रहता है ? उत्तर यह है कि उसका सम्यग्दर्शन उसी में रहता है, परन्तु उस काल में उसका ज्ञानोपयोगं स्वात्मा में उपयुक्त न होकर अन्य पदार्थों में उपयुक्त हो रहा है । इसलिये ऐसा जान पड़ता है कि इसका सम्यग्दर्शन नष्ट हो गया है, पर वास्तविकता यह है कि उस अवस्था में भी सम्यग्दर्शन विद्यमान रहता है । लब्धि और उपयोग रूप परिणमन ज्ञान का है, सम्यग्दर्शन का नहीं । सम्यग्दर्शन तो सदा जागरूक ही रहता है ।