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अध्याय : दूसरा
अनुकम्पा कृपा ज्ञेया सर्वसत्वेष्वनुग्रहः । मंत्रीभावोऽथ माध्यस्थ्य नैशल्यं वैर वर्जनात् ।।४३२॥२२॥
अनुकम्पा का अर्थ कृपा है या सब जीवों पर अनुग्रह करना अनुकम्पा है या मैत्री भाव का नाम अनुकम्पा है या मध्यस्थभाव का रखना अनुकम्पा है या शत्रुता का याग कर देने से निःशल्य हो जाना अनुकम्पा है।
प्रास्तिक्यं तत्वसद्भावे स्वतः सिद्ध विनिश्चितिः । धर्मे हेतौ च धर्मस्य फले चास्त्यादिमतिश्चितः ।।४५२॥पंचाध्यायीउ०१॥२३॥
स्वत: सिद्ध तत्वों के सद्भाव में निश्चय भाव रखना तथा वर्म, धर्म के हेतु और धर्म के फल में प्रात्मा की अस्ति आदि रूप बुद्धि का होना प्रास्तिश्य है । उपयुक्त प्रशमादिगुणों के अतिरिक्त सम्यग्दर्शन के आठ गुणा और भी प्रसिद्ध हैं। जैसा कि निम्नलिखित गाथा से स्पष्ट है--
संवेयो गिब्वेषो रिंगदा गरुहा च उनसमी भत्ती । बच्छल्लं अणुकंपा अट्ट गुरखा हुंति सम्मत्तं ।। (वसु० श्रावकाचार) ॥२५॥
संवेग, निर्वेद, निन्दा, गहीं, उपशम, भक्ति, वात्सल्य और अनुकंपा ये सम्यबत्व के पाठ गुण हैं।
___ बास्तव में ये पाठ गुगा उपर्युक्त प्रशमादि चार गुणों के अतिरिक्त नहीं हैं, योंकि संवेग, उपशम और अनुकंपा ये तीन गुण तो प्रणमादि चार गुराणों में नामोवत ही हैं । निवेद, संवेग का पर्यायवाची है । तथा भक्ति और वात्सल्य संवेग के अभिव्यंजक होने से उसमें गतार्थ हैं तथा निन्दा और गहाँ उपशम (प्रशम) के अभिव्यंजक होने से उसमें गतार्थ हो जाते हैं। प्रश्न :-सम्यग्दर्शन और स्वानुभूति क्या है ? उत्तर :----सम्यग्दर्शन और स्वानुभूति-सम्यग्दर्शन दर्शन मोहनीय का विक और
अनन्तानुबन्धी का चतुष्क इन सात प्रकृतियों के अभाव (अनुदय) में प्रगट होने वाला श्रद्धागुण का परिणामन है और स्वानुभूति स्वानुभूत्यावरगनामक मतिज्ञानावरण के अवान्तर भेद के क्षयोपशम से होने वाला क्षायोपशमिक ज्ञान है । ये दोनों सहभायी हैं। इसलिए कितने ही लोग स्वानुभूति को ही सम्यग्दर्शन कहने लगते हैं, पर वस्तुतः ऐसी बात नहीं है। दोनों ही पृथकपृथक् गुरण हैं । छद्यस्थ का ज्ञान लब्धि और उपयोग रूप होता है, अर्थात्
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