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________________ =0 | [ गोः प्र. चिन्तामणि यहाँ बाट गुण श्रागे चलकर ग्राठ अंगों के रूप में प्रचलित हो गये । रत्नकरण्ड में समन्तभद्र स्वामी ने इन ग्राठ अंगों का संक्षिप्त किन्तु हृदयग्राही वर्णन किया है। पुरुषार्थ सिद्धयुपाय में श्रमृतवन्द्र स्वामी ने भी इनके लक्षण बतलाने के लिये आठ श्लोक लिखे हैं । यह आाट अंगों की मान्यता सम्यग्दर्शन का पूर्ण विकास करने के लिये atra है। अंगों की आवश्यकता बतलाते हुए समन्तभद्र स्वामी ने लिखा है कि जिस प्रकार कम अक्षरों वाला मन्त्र विष- वेदना को नष्ट करने में असमर्थ होता है, उसी प्रकार कम अंगों वाला सम्यग्दर्शन संसार की सन्तति छेदने में असमर्थ रहता है: नाङ्गहीनमतं घेत्तु दर्शनं जन्मसन्ततिम् । नहि मोक्षरम्यूनो निहन्ति विषवेदनाम् ॥१८॥ गंगों का स्वरूप तथा उनमें प्रसिद्ध पुरुषों का चरित रत्नकरण्ड श्रावकाचार . के प्रथम अधिकार से ज्ञातव्य है । प्रश्न : - सम्यग्दर्शन के अन्य गुण कौनसे हैं ? उत्तर : ---- सम्यग्दर्शन के अन्य गुणों की चर्चा-प्रथम, संवेग, अनुकम्पा और श्रास्तिक्य ये सम्यग्दर्शन के चार गुण हैं। वाह्य दृष्टि से ये भी सम्यग्दर्शन के लक्षण है । इनके स्वरूप का विचार पञ्चाध्यायी के उत्तरार्ध में विस्तार से किया गया है । संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है प्रथमो विषयेषुच्चैर्भाव क्रोधादिकेषु च । लोका संख्यात मात्रेषु स्वरूपाच्छथिलं मनः ॥ १४२६॥१६॥ सद्यः कृतापराधेषु यद्वा जीवेषु जातुस्वित् । .. तद्वधादिविकाराय न बुद्धिः प्रशमो मता ।।४२७|| पंचाध्यायी ॥२०॥ पञ्चेन्द्रियों के विषयों में और असंख्यात लोक प्रमाण क्रोधादिक भावों स्वभाव से मन का शिथिल होना प्रथम भाव है । अथवा उसी समय अपराध करने वाले जीवों के विषय में कभी भी उनके मारने आदि की प्रयोजक बुद्धि न होना. प्रणमभाव है । संवेग परमोत्साहो धर्मे धर्मफले चितः । धर्मस्वनुरागो वा प्रीतिर्वा परमेष्ठिषु ॥ ४३१॥२१॥ धर्म में और धर्म के फल में श्रात्मा का परम उत्साह होना अथवा समान . धर्म वालों में अनुराग का होना या परमेष्ठियों में प्रीति का होना संवेग है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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