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अध्याय : पहला
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ना के शरीर में जिस प्रहार हाथ, पैर मादि आठ अंग होते हैं, उन पाठ अंगों के मिलने से ही मनुष्य के शरीर की पूर्णता होती है और वे अंग ही उसे अपना कार्य पूर्ण करने में सहायक होते हैं, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन के नि:शंकित आदि पाठ अंग हैं । इन ग्राट अंगों के मिलने से ही सम्यग्दर्शन . को पूर्णता होती है और सम्यग्दर्शन को अपना कार्य करने में उनसे सहायता मिलती है। कुन्द-कुन्द स्वामी ने अप्टपाहुड के अन्तर्गत चारित्र पाहुइ में चारित्र के सम्यवत्वाचरग और संयमाचरण इस तरह दो भेद कर सम्यक्त्वाचरस्म का निम्नलिखित गाथानों में वर्णन किया है---
एवं चिय गाऊरण यसब्वे मिच्छत्तदोससंकाई. । ... ... .. परिहरि सम्मत्तमला जिणभगिया तिथिहजोएण ।।६।। ।।१५।। गिस्संकिय रिंगवकलिय रिगविवदिगिछा अमूठविट्ठी य ।। उन्नगृहणा ठिदिकरण वच्छल्ल पहावरणा य ते अहः ।।७।। ।।१६।। तं चेय गुणविसुद्धं जिसम्मत्तं सुमुख ठाणाय | .....
जं चरइ पागजुलं पठम सम्मतचरणाचारित्तं ॥८॥ ॥१७॥ .ऐसा जानकर हे भव्य जीवों ! जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे हुए तथा सम्यक्त्व में मल उत्पन्न करने वाले शंका आदि मिथ्यात्व के दोषों का तीनों योगों से परित्याग करो।
निःशंकित, निःकाङक्षित, निविचिकित्सा, अमूढदृष्टि, उपगूहन, स्थितिकरण, का वात्सल्य और प्रभावना ये पाठ सम्यक्त्व के गुण हैं ।
निःशंकितादि गुणों से विशद्ध वह सम्यक्त्व ही जिन-सम्यक्त्व कहलाता है तमो जिनः सम्यक्त्व ही उत्तम मोक्ष रूप स्थान की प्राप्ति के लिये निमित्तभूत है। जान सहित जिन सम्बन्ध का जो मुनि श्राचरण करते हैं, यह पहला सम्यक्त्वाचररा नामक चारित्र है।
तात्पर्य यह है कि शंकादिक दोषों को दूर कर निःशंकित यादि गुणों का आचरण करना सम्यक्त्वाचरण कहलाता है, यही दर्शनाचरण कहलाता है, स्वरूपाचरगा इससे भिन्न है।
... अष्टपाड के अतिरिक्त समयसार की गाथाओं (२२६ से लेकर २३६) में भी कुन्द-कुन्द स्वामी ने सम्यग्दृष्टि के निःशंकित आदि गुणों का वर्णन किया है।
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