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[ गो. प्र. चिन्तामणि
क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन की जघन्य स्थिति श्रन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट छियासठ सागर प्रमाण है । क्षायिक सम्यग्दर्शन उत्पन्न होकर नष्ट नहीं होता, . इसलिये इस अपेक्षा उसकी स्थिति सादि ग्रनन्त है, परन्तु संसार में रहने की अपेक्षा जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहुर्त सहित आठ वर्ष कम दो करोड़ वर्ष पूर्व तथा तैतीस सागर की है ।
प्रश्न : सम्यग्दर्शन का विधान क्या है ?
उत्तर: - सम्यग्दर्शन के विधान - भेदों का वर्णन पिछले स्तम्भ में आ चुका है। सम्यत्व मार्गा और उसका गुणस्थानों में अस्तित्व . सभ्यत्व मार्गा के श्रपशमिक सम्यग्दर्शन, क्षायिक सम्यग्दर्शन, श्रयोपशमिक सम्यग्दर्शन, सम्य मिथ्यात्व सासादन और मिध्यात्व ये छ: भेद हैं । औपशमिक सम्यग्दर्शन के दो भेद हैं- प्रथमोपणम और द्वितीयोपशम इनमें प्रथमोपशम चौथे से लेकर साल तक और factory चौथे से लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है । क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन चौथे से लेकर सातवें तक होता है और क्षायिक सम्यग्दर्शन चौथे से लेकर चौदहवे तक तथा सिद्ध यवस्था में भी रहता है । सम्यङ् मिथ्यात्व मार्गगा तीसरे गुणस्थान, में सासादन मार्गणा दूसरे गुगास्थान में और मिध्यात्व मार्गमा पहले गुणस्थान में होती है । इसमें जीव के परिणाम दही और गुड़ से मिले हुए स्वाद के समान सम्यवत्व और मिथ्यात्व दोनों रूप होते हैं। इस मार्गणा में किसी का मरण नहीं होता और न मारगान्तिक समुद्धात ही होता है । श्रपशमिक सम्ययत्व का काल एक समय से लेकर छह सावली तक शेष रहने पर अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान- माया लोभ में से . किसी एक कपाय का उदय थाने से जिनका सम्यक्त्व श्रासादना -विराधना से सहित हो गया है, वह मिथ्यात्व के अगृहीत और गृहीत की अपेक्षा दो भेद एकान्त, विपरीत, संशय, अज्ञान और वैनयिक की अपेक्षा पांच भेद अथवा गृहीत, गृहीत और सांशयिक . की अपेक्षा तीन भेद होते हैं ।
के पाचिन्द तमसायते गृहीतं ग्रहायतेऽस्येपाम् ।
मिथ्यात्वमिह ग्रहीत शल्यति सांशयिकमपरेषाम् ||2|| सा० व १४
प्रश्न : --- सम्यग्दर्शन के अंग कौन-कौन से हैं ?.
उत्तर :--- सम्यग्दर्शन के आठ अंग :- जिन्हें मिलाकर अंगी की पूर्णता होती है प्रवा संगी को अपना कार्य पूर्ण करने में जो सहायक होते हैं, उन्हें ग्रंग कहते हैं
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