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- अध्याय : दूसरा ] .
[ ७७ ही होती है, इसलिये आगे को देवियों का समावेश पहले-दूसरे स्वर्ग की देवियों में ही समझना चाहिये।
इन्द्रियों की अपेक्षा संज्ञी पञ्चेन्द्रियों को तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं। अन्य न्द्रियं वालों के एक भी नहीं होता । काय की अपेक्षा त्रसकायिक जीवों के तीन होते । परन्तु अयोगियों के मात्र क्षायिक ही होता है । वेद की अपेक्षा तीनों वेदों में तीनों
सम्यग्दर्शन होते हैं, परन्तु अपगत वेद बालों के प्रीपशमिक और क्षायिक ही होते हैं । यहाँ वेद से तात्पर्य भाववेद से है । कपाय की अपेक्षा क्रोधादि चारों कषायों में तीनों होते हैं, परन्तु अकषाय-कषाय रहित जीवों के प्रौपशमिक और क्षायिक ये दो होते है। औपशमिक मात्र या गुरमस्थान तक रहा है । शान की अपेक्षा मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ज्ञान के धारक जीवों के तीनों होते हैं, परन्तु केवलज्ञानियों के एक क्षायिक ही होता है । संयग की अपेक्षा सामायिक और छेदोंपस्थापना संयम के धारक जीवों के तीनों होते हैं, परिहार विशुद्धि वाले के औपशामिक नहीं होता; शेष दो होते हैं और संयतासंयत तथा असंयतों के तीनों होते हैं । दर्शन की अपेक्षा त्रा,
चक्ष और अनधि दर्शन के धारक जीवों के तीनों होते हैं, परन्तु केवल दर्शन के धारक जीवों के एक क्षायिक ही होता है । लेश्या की अपेक्षा छह लेश्याओं बालों के । तीनों होते हैं, परन्तु लेण्या रहित जीव के एक क्षायिक ही होता है । भव्य जीवों की की अपेक्षा भव्यों के तीनों होते हैं, परन्तु अभव्यों को एक भी नहीं होता । सम्यक्त्व की अपेक्षा जहाँ जो सम्यग्दर्शन होता है, वहाँ उसे ही जानना चाहिये । संज्ञा की अपेक्षा संज्ञियों के तीनों होते हैं, असंजियों को एक भी नहीं होता । संज्ञी और प्रसंज्ञी के व्यपदेश से रहित सयोग केवली और प्रयोग केवली के एक क्षायिक ही होता है। आहार की अपेक्षा याहारकों को तीनों होते हैं, छदास्थ आहारकों के भी तीनों होते हैं, परन्तु समुद्घात केवली अनाहारक के एक क्षायिक ही होता है।
प्रश्न :-- सम्यग्दर्शन का प्रधिकरण क्या है. ? . . .... 3 उत्तर :-श्राधिकरगा के बाह्य और अभ्यन्तर' की अपेक्षा दो भेद हैं ! अभ्यन्तर
अविकरगा स्वस्वामिसम्बन्ध से योग्य प्रात्मा ही है और वाह्य अधिकरण एक राजू चीड़ी तथा चौदह राजू लम्बी लोक नाड़ी है। प्रश्न :--सम्यग्दर्शन की स्थिति क्या है ? उत्तर :-ग्रौपशमिक सम्यग्दर्शन की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है। .
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