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[ गो. प्र. चिन्तामणि
सम्यग्दर्शन का स्वामी कौन है ? इस प्रश्न का विचार सामान्य और विशेष रूप से किया गया है । सामान्य की अपेक्षा से सम्यग्दर्शन संज्ञीपञ्चेन्द्रिय पर्याप्तिक satta के ही होता है । अतः वही इसका स्वामी है । विशेष की अपेक्षा विचार इस प्रकार है - निम्नलिखित चौदह मार्गणात्रों में होता है
मइ इन्दिये च काये जोगे वेदे कसाय खाय ।
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संजम दंसर लेस्सा भविया सम्मत सति श्राहारे || जी० का०॥१३॥ गति की अपेक्षा नरकगति में सभी पृथिवियों के पर्याप्तक नारकियों के raft और क्षायोपशमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । तिर्यंचगति में श्रमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्ति तिर्यंचों के ही होता है प्रौर क्षायिक तथा क्षायोपशमिक भोगभूमिज तिचों की अपेक्षा होते हैं । तिर्यचियों के पर्याप्तक तथा अपर्याप्तक दोनों ही
स्थायों में क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं होता, क्योंकि दर्शन मोह की क्षपणा का प्रारम्भ कर्मभूमिज मनुष्य के ही होता है और क्षपणा के पहले तिर्यञ्च श्रायु का बन्ध करने वाला मनुष्य, भोग भूमि के पुरुषवेदी तिर्यंचों में उत्पन्न होता है, स्त्रीवेदी तिर्यंचों में नहीं | नवीन उत्पत्ति की अपेक्षा पर्याप्तक तिर्यञ्चयों के औपशमिक और क्षायोप. शमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं। मनुष्यगति में पर्याप्त और अपर्याप्तक मनुष्यों के क्षायिक र क्षायोपशमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । औपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तक मनुष्यों के ही होता है, अपर्याप्त मनुष्यों के नहीं, क्योंकि प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन में किसी का मरण होता नहीं है और द्वितीयोपण सम्यग्दर्शन में मरा हुआ जीव . नियम से देवगति में ही जाता है । मानुषी स्त्रीवेदी मनुष्यों के पर्याप्त अवस्था में तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं; परन्तु अपर्याप्तक अवस्था में एक भी नहीं होता । मानुषियों के जो . क्षायिक सम्यग्दर्शन बतलाया है, वह भाववेद की अपेक्षा होता है, द्रव्यवेद की अपेक्षा नहीं । देवगति में पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोनों के तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन में जीव मरकर देवों में उत्पन्न होते हैं, इस अपेक्षा वहां अपयप्तिक वस्था में भी सिक सम्यग्दर्शन का सद्भाव रहता है । भवनवासी, व्यन्तर ज्योतिष्क देव, उनकी देवाङ्गनाओं तथा सौधर्मेशान की देवांगनात्रों के अपर्याप्तक अवस्था में एक भी सम्यग्दर्शन नहीं होता, किन्तु पर्याप्त अवस्था में नवीन उत्पत्ति की अपेक्षा श्रमिक और क्षायोपशमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । स्वर्ग में देवियों का सद्भाव यद्यपि सोलहवें स्वर्ग तक रहता है, तथापि उनकी उत्पत्ति दूसरे स्वर्ग तक