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________________ [ ७५ : अध्याय दूसरा ] गरंगत ज्ञान के कारण बीजों के समूह से, जो सभ्यवत्व होता है, उसे बीजसत्य कहते हैं । पदार्थों के संक्षेपरूप कथन को सुनकर, जो श्रद्धान होता है, उसे संक्षेपसम्यक्त्व कहते हैं । विस्ताररूप जिनवाणी को सुनने से जो बद्धान होता है, उसे विस्तारसम्यक्त्व कहते हैं । जैनशास्त्र के वचन बिना किसी अर्थ के निमित्त से, जो श्रद्धा होती है, उसे यत्व कहते हैं । श्रुत केवली के तत्वान को अवगादसम्यवत्व कहते हैं । केवली के तत्वश्रद्धान को परसावगाढसम्यत्रत्व कहते हैं । इन दस भेदों में प्रारम्भ के आठ भेद कारण की पेक्षा और ग्रन्त के दो भेद ज्ञान के सहकारीपना की अपेक्षा किये गए हैं । इस प्रकार शब्दों को प्रक्षा संख्यात श्रद्धान करने वालों की अपेक्षा असंख्यात और श्रद्धान करने योग्य पदार्थों की अपेक्षा अनन्त भेद होते हैं । प्रश्न :- सम्यग्दर्शन का निर्देश आदि की अपेक्षा से वर्णन किस प्रकार है ? उत्तर: -- सम्यग्दर्शन का निर्देश यादि की अपेक्षा वर्णन - तत्त्वार्थ सूत्रकार उमास्वामी ने पदार्थ के जानने के उपायों का वर्णन करते हुए निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान इन छह उपायों का वर्णन किया है । 'निर्देश स्वामित्व साधनाधिकरणस्थिति विधानतः ' - त० सून १ - - ७ । . यहां सम्यग्दर्शन के संदर्भ में इन उपायों का भी विचार करना उचित जान पड़ता है । वस्तु के स्वरूप निर्देश को निर्देश कहते हैं । वस्तु के श्राधिपत्य को स्वामित्व कहते हैं । वस्तु की उत्पत्ति के निमित्त को साधन कहते हैं । वस्तु के ग्राधार को किरण कहते हैं | वस्तु की कालावधि को स्थिति कहते हैं और वस्तु के प्रकारों को विधान कहते हैं । संसार के किसी भी पदार्थ के जानने में इन छह उपायों का यलम्बन लिया जाता है ।. यहां सम्यग्दर्शन का निर्देश स्वरूप क्या है ? इसका उत्तर देने के लिये कहा गया है कि यथार्थ देव शास्त्र - गुरु का श्रद्धान करना अथवा सप्त तत्त्व नौ पदार्थ का श्रद्धान करना आदि सम्यग्दर्शन का निर्देश हैं ।.
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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