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[ गो. प्र. चिन्तामणि चरगानुयोग की पद्धति से सम्यग्दर्शन के निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा दो भेद होते हैं। वहां परमार्थ देव-शास्त्र-गुरु की विपरीताभिनिवेश से रहित श्रद्धा . करने को निश्चय सम्यग्दर्शन कहा जाता है और उस सम्यग्दृष्टि की पच्चीस दोषों में, रहित जो प्रवृत्ति है, उसे व्यवहार सम्यग्दर्शन कहा जाता है । शङ्कादिक पाठ दोष नाट माद, छह अनायतन और तीन मुढताएँ ये व्यवहार सम्यग्दर्शन के पच्चीस दोष का कहलाते हैं।
द्रव्यानयोग की दृष्टि से सम्यग्दर्शन के भेद-द्रव्यानयोग की पद्धति से भी सम्यग्दर्शन के निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा दो भेद होते हैं। यहां जीवाजीवादि। सात तत्वों के विकल्प से रहित शुद्ध आत्मा के श्रद्धान को निश्चय सम्यग्दर्शन कहते । हैं और सात तत्वों के विकल्प से रहित श्रद्धान को व्यवहार सम्यग्दर्शन कहते हैं ।
अध्यात्म में बीतराग सम्यग्दर्शन और सराग सम्यग्दर्शन के भेद से दो भव होते हैं । यहां यात्मा की विशुद्धि मात्र को वीतराग सम्यग्दर्शन कहा है और प्रशम, । • संवेग, अनुकम्पा और नास्तिवय इन चार गुमगों की अभिव्यक्ति को सराग सम्यग्दर्शन कहते हैं। .
. . . . आज्ञा मार्ग समुद्भवमुपदेशात्सूत्र बोज संक्षेपात् । विस्तारार्थाभ्यां भवमवगाढं परमावगादं च ॥१॥ प्रात्मानुशासन ॥२॥
पारमानुशासन में ज्ञान प्रधान निमित्तादिक की अपेक्षा १. पाना सम्यवत्व २. मार्ग सम्यक्त्व ३. उपदेश सम्वत्व ४. सूत्र सम्यवत्व ५. बीज सभ्यवत्व ६. संक्षेप सम्यक्त्व ७. विस्तार सम्यक्त्व ८. अर्थ सम्यक्त्व है.. अवगाइ सम्यक्त्व और १० परमावगाढ़ सम्यक्त्व ये दस भेद कहे हैं।
मुझे जिन याज्ञा प्रमाण है, इस प्रकार जिनाज्ञा की प्रधानता से ; जो सूक्ष्म अन्तरित एवं दूरवर्ती पदार्थों का श्रद्धान होता है, उसे आज्ञासम्यक्त्व कहते हैं । ...
निर्गन्थ मार्ग के अवलोकन से, जो सम्यवस्व होता है, उसे मार्गसम्यत्रत्व
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कहते हैं।
आगमन पुरुषों के उपदेश से उत्पन्न सम्यगदर्शन उपदेशसभ्यवत्व कहलाता है।
मुमुनि के प्राचार का प्रतिपादन करने वाले प्राचार सूत्र को सुनकर, जो श्रद्धान होता है, उसे सूत्रसम्यक्त्व कहते हैं।