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________________ EmorehindiARNAMESH अध्याय : दूसरा [ ७३ - मिलने पर सम्यग्दर्शन होता भी है और नहीं भी होता है। सम्यग्दर्शन के वहिरङ्ग निमित्त चारों गतियों में विभिन्न प्रकार के होते हैं । जैसे नरक गति में तीसरे नरक तक जातिस्मरण, धर्मश्रवण और तीव्र वेदनातुभव ये तीन । . चौथे से सातनं तक जातिस्मरण और तीन वेदनानुभव ये दो । तिर्यञ्च और :मनुष्यगति में जातिस्मरण, चमश्रवा और जिनविम्ब दर्शन ये तीन । देवगति में बारहवें स्वर्ग तक जातिस्मरण, धर्मश्रवण, जिनकल्याणकदर्शन और देवद्धि दर्शन ये चार । तेरहवें से सोलहवं स्वर्ग तक देवद्धि दर्शन को छोड़कर तीन और उसके प्रागे नौवें अवेयक तक जातिस्मरण तथा धर्मश्रवण दो। वहिरङ्ग निमित्त हैं । वेयक के ऊपर सम्यग्दृष्टि ही उत्पन्न होते हैं, इसलिये वहां बहिरङ्ग निमित्त की अावश्यकता नहीं है। प्रश्न :- उत्पत्ति की अपेक्षा सम्यग्दर्शन के कितने भेद हैं ? । :--सम्यग्दर्शन के भेद--उत्पति की अपेक्षा सम्यग्दर्शन के निसगंज और अधि: गमज दो भेद हैं । जो पूर्व संस्कार की प्रबलता से परोपदेश के बिना हो। — जाता है, वह निसर्गज सम्यग्दर्शन कहलाता है । और जों पर के उपदेशापूर्वक होता है, वह अधिगमज सम्यग्दर्शन कहलाता है। इन दोनों भेदों में अन्तरङ्ग कारण-सात प्रकृतियों का उमशमादिक समान होता है, मात्र बाह्यकरगा की अपेक्षा दो भेद होते हैं। करगानुयोग की पद्धति से सम्यग्दर्शन के सौपशमिक, क्षायिक और क्षायोप। शमिक ये तीन भेद होते हैं । जो सात प्रकृतियों के उपशम से होता है, उसे औपसमिक कहते हैं। इसके प्रथमोपशम और द्वितीयोपशम की अपेक्षा दो भेद हैं । जो सात प्रकुतियों के क्षय से होता है, उसे क्षायिक कहते हैं और जो सर्ववाती छह प्रकृतियों के उदयाभावी 'क्षय और सदवस्थारूप उपशम तथा सम्यक्त्व प्रकृति नामक देशघाती "प्रकृति के उदय से होता है, उसे क्षायोपशमिक कहते हैं अथवा वेदक सम्यग्दर्शन कहते हैं। कृतकृत्य सम्यग्दर्शन भी इसी क्षायोपशामिक सम्यग्दर्शन का अवान्तर भेद है। - दर्शन मोहनीम की क्षपणा करने बाले जिस क्षायोपशसिक सम्यग्दृष्टि के मात्र सम्यक्त्व प्रकृति का उदय शेष रह जाता है, शेष की अपगणा हो चुकी है, उसे कृतकल्य वेदक सम्बग्दृष्टि कहते हैं। । SEASESS
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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