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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणिः । मायिक सम्यग्दष्टि या तो उसी भव से मोक्ष चला जाता है या तीसरे भवः में या चौथे भव में, चौथे भव से अधिक संसार में नहीं रहता। दंसरण मोहे खविदे सिज्झदि एक्केव तदिय-तुरियभवे । णादिकवि तुरियभवं ए विरणसदि सेससम्म व ॥क्षे.जी.का.स.प्र.1 जो क्षायिक सम्यग्दृष्टि बायाक. होने से नरक में जाता है अथवा देवगतिः । में उत्पन्न होता है, वह वहीं से मनुष्य होकर मोक्ष जाता है । इस प्रकार चौथे भव में । उसका मोक्ष जाना बनता है। चत्तारि वि खेसाई, अायुगबंधेढ होई सम्मत्तं । अणुबद-महत्वदाई ण लहइ देयाउगं मोत्तु ।।६५२।।जी.का.॥१०॥ चारों गति सम्बन्धी आयु का बन्ध होने पर सम्यक्त्व हो सकता है, इसलिये । ब्रद्वायुष्क सम्यग्दृष्टि का चारों गतियों में जाना संभव है। परन्तु यह नियम है कि । सम्यक्त्व के काल में यदि मनुष्य और तिर्यञ्च के आयु बन्ध होता है, तो नियम से । देवायु का ही बन्ध होता है और नारकी तथा देव के नियम से मनुष्यायु का ही बंध होता है। प्रश्न :-सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के बहिरंग कारण कौनसे है ?... उत्तर :- सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के बरिङ्ग कारग :-कारण दो प्रकार के होते हैं. एक उपादान कारण और दूसरा निमित्त कारण । जो स्वयं कार्य रूप परि । गात होता है, वह उपादान कारण कहलाता है । और जो कार्य की सिद्धि में । सहायक होता है, वह निमित्त कारग कहलाता है । अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग । के भेद से निमित्त के दो भेद हैं । सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का उपादान कारणे । प्रासन भव्यताकर्म हानिसंज्ञित्व शुद्धि भाक् । . देशनाद्यस्त मिथ्यात्वो जीवः सम्यक्त्वमश्नुते ।सा.ध.।।११।। ...अासन्न भव्यता आदि विशेषताओं से युक्त प्रात्मा है । अन्तरङ्ग निमित्त कारण सम्बवत्व की प्रतिबन्धक सात प्रकृतियों का उपशम अथवा क्षयोपशम है । और बहिरङ्ग निमित्त कारण सद्गुरू आदि हैं। अन्तरङ्ग निमित्त कारण . के मिलने पर सम्यग्दर्शन, नियम से होता है, परन्तु बहिरङ्ग निमित्त के । S 'v. MAHBORRORSCORIANDEDNAGAR
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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