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अध्याय : दुसरा
आने वाले निकों का सदबस्थारूप उपशम और सम्यवत्व प्रकृतिनामक देशचाती प्रकृति का उदय रहने पर जो सम्यक्त्व होता है, उसे क्षायोपशमिक सम्यक्त्व कहते हैं । इस सम्यक्त्व में सम्यक्त्व प्रकृति का उदय होने से बल, मल और अगाढ़ दोष उत्पन्न होते रहते हैं। छह सर्वघाती प्रकृतियों के उदयाभावो क्षय और सदवस्थारूप उपशम को प्रधानता देकर जब इसका वर्गान होता है, तब इसे क्षायोपशमिक कहते हैं और जब सम्यक्त्व प्रकृति के उदय की अपेक्षा वर्णन होता है, तब इसे वेदक सम्यग्दर्शन कहते हैं।
बैंसें ये दोनों पर्यायवाची हैं। . .. .. इसकी उत्पत्ति मादि मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि दोनों के हो सकती है। सादि मिथ्यांदृष्टियों में जो वेदक काल के भीतर रहता है, उसे वेदक सभ्यग्दर्शन ही होता है। सम्यग्दष्टियों में जो प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि है, उसे भी वेदक सम्यग्दर्शन ही होता है । प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि जीव को चौथे से लेकर सातवें गुणस्थान तक किसी भी गुणस्थान में इसकी प्राप्ति हो सकती है, यह सम्यग्दर्शन चारों गतियों में उत्पन्न हो सकता है। प्रश्न :-क्षायिक सम्यग्दर्शन का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- क्षायिक सम्यग्दर्शन-मिथ्यात्व, सम्यङमिश्यात्व, सम्यक्त्व प्रकृति और
असन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन सात प्रकृतियों के क्षय से जो सम्यक्त्व उत्पन्न होता है, वह क्षायिक सम्यक्त्व कहलाता है। दसण मोहयखवरणाषट्ठवगो कम्मभूमि जादो हु। मणुसो. केवलि मूले गिढ़वगो होदि सब्वत्थ ॥७४॥जी.का.॥८॥
दर्शन मोहनीय की क्षपणा का प्रारम्भ कर्म भूमिज मनुष्य ही करता है, और बह भी केवली या श्रुत केवली के पाद मूल में।
. स्वयं श्रुत केवली हो जाने पर फिर केवली या श्रुत केवली के सान्निधान की आवश्यकता नहीं रहती। . .. .... ... ::. परन्तु इसका निष्ठापन चारों गतियों में हो सकता है । यह सम्यग्दर्शन वेदक
सम्यक्त्व पूर्वक ही होता है तथा चौथे से सातवें गुरुपस्थान तक किसी भी गुग्णस्थान में तो हो सकता है । यह सम्यग्दर्शन सादि अनन्त है । होकर कभी छुटता नहीं है, जबकि
पिशमिक पार क्षायोपशामिक सम्यग्दर्शन असंख्यात बार होकर छुट सकते हैं ।
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