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________________ LAM.AJANwAR'2025 [ गो. प्र. चिन्तामणि ROMomiche इन चार प्रकृतियों का इस प्रकार सात प्रकृतियों के उदय का अभाव होने पर प्रथमो. पशम सम्यक्त्व होता है । यही भाव पटवण्डागम (धवल, पुस्तक ६) के निम्नलिखित । सूत्रों में भी प्रगट किया है-- 'अहदहेदा मिच्छतं तिणि भागं करेदि सम्मतं मिच्छत्तं ॥७॥ .. अर्थ-- अन्तरकरग करके मिथ्यात्व कर्म के तीन भाग करता है-सम्यक्त्व, । मिथ्यात्व और सम्यमिथ्यात्व । दसरस मोहरणीय कम्म उवसामेदि ।।८।। अर्थ-मिथ्यात्व के तीन भाग करने के तश्चात् दर्शन. मोहनीय कर्म को उपशमाता है। . . .. . . . . प्रश्न :-द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-द्वितीयोपशमः सम्यग्दर्शनं-ग्रौपशमिक सम्यग्दर्शन के प्रथमोपशम और । द्वितीयोपशम इस प्रकार दो भेद हैं। इनमें से प्रथमोपशम किसके और अब होना है। इसकी चर्चा जार पा चुकी है। द्वितीयोपशम की चर्चा इस प्रकारः । है । प्रथमोपणम और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन का अस्तित्व चतुर्थ गुणस्थानः । से लेकर सातवें गुगास्थान तक ही रहता है । क्षायोपशामिक सम्यवत्व को। धारण करने वाला कोई जीव, जव सातवें गुग्ग स्थान के सातिशय अप्रमत्त । भेद में उपशम श्रेणी माड़ने के सम्मुख होता है, तब उसके द्वितीयोपशम । सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है । इस सम्यग्दर्शन में अनन्तानुवन्धी चतुष्क की । विसंयोजन, और दर्शन मोहनीय की प्रकृतियों का उपशम होता है। इस सम्यग्दर्शन को धारण करने वाला जीव उपशम श्रेणी माइकर न्यारहवें गुग्गस्थान तक जाता है, और वहाँ से पतन कर नीचे पाता है, पतन की अपेक्षा चतुर्थ, पञ्चम और पप्ठम गुगास्थान में भी इसका सद्भाव ।।। रहता है। प्रश्न :---क्षायोपशमिक (बेदक) सम्यग्दर्शन का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :- क्षायोपशमिक अथवा वेदक सम्यग्दर्शन--मिथ्यात्व, सम्या मिथ्यात्व अनन्ता. नुवन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन छह सर्वघाती प्रकृतियों के वर्तमान काल . में उदय पाने वाले निकों का उदयाभावी अय तथा प्रागारी काल में उदय । ""." "
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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