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________________ : अध्याय : दूसरा उपयुक्त तीन करणों में से पहले अथाप्रवृत अथवा अधःकरण में चार अवश्य होते है-(१) समय-समय में अनन्त गुणी विशुद्धता होती है। (२) प्रत्येक अन्तमहत में नबीन बन्ध की स्थिति घटती जाती है। (३) प्रत्येक समय प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग अनन्त गुगणा वढ़ता जाता है; और (८) प्रत्येक समय अप्रशस्त प्रतियों का अनुभाग अनन्तवाँ भाग घटता जाता है । इसके बाद अपूर्वकरण परि शाम होता है । उस अपूर्वकरण में निम्नलिखित प्रावश्यक और होते हैं। (१) सत्ता . र में स्थित प्रत्येक अन्तर्मुहूर्त में उत्तरोत्तर घटती जाती है, अतः स्थितिकाण्डकपात होता है । (२) प्रत्येक अन्तर्मुहूर्त में उत्तरोत्तर पूर्व कर्म का अनुभाग घटता जाता है इसलिये अनुभागकाण्डकधात होता है और (३) गगणश्रेणी के काल में क्रम से असंख्यात गुणित कर्म, निर्जरा के योग्य होते हैं, इसलिये मुरगश्रेणी निर्जरा होती है। इस अपूर्व करमा में गुरण संक्रमण नाम का अावश्यक नहीं होता। किन्तु चारित्र मोह . । का उपशम करने के लिए जो अपुर्वकरण होता है, उसमें होता है। अपूर्वकरण के बाद अनिवृत्तिकरण होता है, उसका काल अपूर्वकरण के काल के संख्यातवें भाग. . । होता है । इसमें पूर्वोक्त अावश्यक सहित कितना ही काल व्यतीत होने पर | किमन्तर. । करण नाम? "विवक्खियकम्मारग हेद्विमोवरिमद्विदीयो मोत्तुग मउसे अंतो मुहत्तमेत्तार्ण टिळदीगण परिणाम विसेसैग पिसेगारणमभावावीकरण मन्तरण मिदि भण्गदे ।" जय । धवल अ. प्र. १५३ । अर्थ :--अन्तरकरगा का क्या स्वरूप है ? : उत्तर :--विवक्षित .. माँ की अधस्तन और उपरिम स्थितियों को छोड़कर मध्यवर्ती अन्तर्मुहर्त मात्र स्थितियों के निषेकों का परिणाम विशेष के द्वारा प्रभाव करने को अन्तरकरण कहते हैं।] अन्तरकरण होता है अर्थात् अनिवृत्तिकरण के काल के पीछे, उदय प्राने योग्य . मिथ्यात्य कर्म के निपकों का अन्तमुहर्त के लिए अभाव होता है । अन्तरकररा के .. पीछे उपशमकरणा होता है अर्थात् अन्तरकरण के द्वारा प्रभाव रूप किये हुये नियकों के ऊपर जो मिथ्यात्व के निषेक उदय में आने वाले थे, उन्हें उदय के अयोग्य किया जाता है। साथ ही अनन्तानुबन्धी चतुष्क को भी उदय · के अयोग्य किया जाता . है। इस तरह उदय योग्य प्रकृतियों का प्रभाव होने से प्रथमोपशम सम्यक्त्व के प्रथम समय में मिथ्यात्व प्रकृति के तीन खण्डं करता है । परन्तु राजवातिक में, अनिवृत्तिकरणा के चरम समय में मिथ्यादर्शन के तीन भाग करता है- सम्यक्त्व, मिथ्यात्य . और सम्यमिथ्यात्व । इन तीन प्रकृतियों तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ.
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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