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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि से लेकर पन्द्रह नम्वर तक के हैं। पहले समय में रहने वाले जीव के छह से लेकर दस नम्बर तक के परिणाम विभिन्न समयवर्ती होने पर भी परस्पर मिलते-जुलते हैं । इसी प्रकार प्रपत्र माडी गनेक जीवों के एक से लेकर । दस तक के परिणामों से समान परिणाम हो सकते हैं अर्थात् किन्हीं दो। जीवों के पांच नम्बर का परिणाम है । यह परिणामों की समानता और असभानता नाना जीवों की अपेक्षा घटित होती हैं । इस करण का काल अन्तमुहूर्त है और उसमें उत्तरोत्तर समान वृद्धि को लिए हुए असंख्यात लोक प्रमाण होते हैं। जिसमें प्रत्येक समय अपूर्व-अपूर्व नये-नये परिणाम होते हैं, उसे अपूर्वकरण कहते हैं। जैसे पहले समय में रहने वाले जीवों के यदि एक से लेकर दस नम्बर तक के परिणाम हैं, तो दूसरे समय में रहने वाले जीव के ग्यारह से दीस नम्बर तक के परिणाम होते हैं। अपूर्वकरण में समसमयवर्ती जीवों के परिणाम समान और असमान दोनों प्रकार के होते हैं, परन्तु भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणाम असमान ही होते हैं। जैसे पहले समय में रहने वाले और दूसरे समय में रहने वाले जीवों के परिरणाम कभी समान नहीं होते, परन्तु पहले अथवा दूसरे समय में रहने वाले जीवों को परिणाम समान भी हो सकते है और असमान भी। यह चर्चा भी नाना. जीवों की.. अपेक्षा से है। इसका काल भी अन्तमुहर्त प्रमाण है। परन्तु यह अन्तमुंहत अधःप्रवृत्तकरण के अन्तर्मुहुत से छोटा है । इस अन्तर्मुहूर्त प्रमाण काल में भी उत्तरोत्तर । वृद्धि को प्राप्त होते हुए असंख्यात लोक प्रमाण परिणाम होते हैं। - जहाँ एक समय में एक ही परिणाम होता है, उसे अनिवृत्तिक रगग कहते हैं। इस कररंग में समसमयवर्ती जीवों के परिणाम समान ही होते हैं और विषम समयवर्ती । जीवों के परिणाम असमान ही होते हैं । इसका कारण है कि यहाँ एक समय में एक ही परिणाम होता है, इसलिये उस समय में जितने जीव हांगे इन सबके परिणाम समान ही होंगे और भिन्न समयों में जो जीव होंगे उनको परिणाम भिन्न ही होंगे। इसका काल भी अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है । परन्तु अपूर्वकरण की अपेक्षा छोदा अन्तमहत है । इसके प्रत्येक समय में एक ही परिणाम होता है। इन दोनों कर रगों में परिणामों की विशुद्धता उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है। ...... yagdis
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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