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________________ अध्याय : दसवां ] Trade Enter घेत्य सिद्धार्थपादपाः । स्तूपाः सतोरणा: मेहाः प्राकारा वनवेदिकाः ।।१६०५ ॥ बनायो बुधैः प्रोक्ता उत्सेधेन द्विषगुखाः । fraiगोत्से धतrasi देर्व्यानुरूप विस्तरः ॥ १०६॥ पार्श्व पुराण में भी लिखा है - मानस्तम्भाश्च प्राकाराः सिद्धार्थ चेत्य पादपाः । 'सतोरणा: गृहाः स्तम्भाः केतवो वनवेदिकाः ।। १६०७।। प्रोक्तास्तीर्थ कस्ले धात्तु मेन द्विषड्गुणाः । [ ६०५ इस प्रकार जानना । प्रश्न :- चतुर्गति निगोद दो प्रकार है-एक नित्य निगोद और एक इतर निगोद, इन दोनों निगोदों में क्या अन्तर है ? उत्तर :- जो अनादिकाल से एकेन्द्रिय कर्म के उदय से सदा स्थावर गति में ही जन्म-सरण करते रहें तथा जो भूत भविष्यत् वर्तमान किसी भी काल में भी दो इन्द्रिय प्रादि स पर्याय धारण न करें। जिनकी स्थावर गति का न आदि है, न अन्त है, सदा अनन्त काय के आश्रित जन्म-मरण धारण करते रहें, ऐसे जीवों को नित्यनिगोदिया जीव कहते हैं । इसीलिए इस गति को नित्य गति अथवा शाश्वत गति ऐसा सार्थक नाम कहा है। तीव्र पाप कर्म के उदय से अनन्तानन्त जीव इस नित्यनिगोद में सदा रहते हैं । सो ही सिद्धान्तसार में लिखा हैसत्वं न प्रपद्यन्ते कालेन त्रितयेऽपि ये । ज्ञेया नित्यनिगोदास्ते भूरि पाप वंशी कृताः ॥ १०८ ॥ श्री गोमट्टसार में भी लिखा है जत्थि अरणन्ता जीवा जेहि रंग पतो तसा परिणामो भावकलंक सपउरा सिगोदवासं न मुञ्चन्ति ॥ १०६ ॥ तथा जिससे निकलकर त्रस गति को प्राप्त करे अथवा त्रस गति पाकर फिर जिस निगोद में जाय, उसको इतर निगोद कहते हैं । इस प्रकार निगोद दो प्रकार के हैं । निगोद शब्द की निरुक्ति इस प्रकार है---जो अपने शरीर के श्रंग रूपी क्षेत्र में रहने के लिए अनन्तानन्त जीवों को जगह देवे, उसको निगोद कहते हैं । नि-नियतं गां. ( गो शब्द का द्वितीया का एकवचन )
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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