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________________ sinilaviarranthyart - ------ ----- --- म -- - - ६०६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि भूमि क्षेत्र अनन्तानन्त जीवानां द-ददातीति निगोदभ् । निगोदं शरीरं येषां ते निगोद शरीराः । अर्थात-नि का अर्थ नियत है, गो शब्द का अर्थ क्षेत्र वा निवास स्थान है और द शब्द का अर्थ देना है। जो नियम से अपने शरीर में अनन्तानन्त जीवों को उत्पन्न होने के लिए क्षेत्र देवे, उसको निगोंद कहते हैं और ऐसे शरीर को निगोद शरीर कहते हैं। प्रश्न :--जिन भगवान का गंधोदक कहां-कहां लगाना चहिये ? उत्तर :-यह कहना ठीक नहीं है, यह कहना कपोलकल्पित और अज्ञान भरा हुआ है, क्योंकि श्री ऋषभदेव के जन्याभिषेक के गंधोदक का जल इन्द्रादिक सब देदों ने अपने मस्तक से लगाया तथा मेरु पर्वत के ऊपर उस गन्धोदक के जल का प्रवाह नदियों के समान बह निकला। इस बहते हुए जल में देवों ने स्नान किया वह जल लेकर परस्पर एक दूसरे के ऊपर डाला । भावार्य- उस जल में परस्पर जलक्रीड़ा की और उस गन्धोदक के जल को लेकर स्वर्ग में भेजा। ऐसा वर्णन शास्त्रों में लिखा है- देखो भगबज्जिनसोनाचार्य प्रणीत आदि पुराण के दशवें पर्व में - कृतं गंधोदकरित्यभिषेकं सुरोत्तमाः । जगतां शांतये शांति घोषयामासुरुच्चकै ॥१६१०।। प्रचारतमांगेषु चक : साग संगतम् । स्वर्गस्योपायनं चक्र स्तगंधांबु दिवौकसः ।।१६११॥ गंधाधुस्नपनस्यति जयकोलाहलैः सममम् । व्यातुक्षीममराः चक : सचूरगंधवारिभिः ॥१९१२॥ लब्धयादि पुराण में भी यही बात लिखी है - तगंधांबु प्रवंधोच्चैकस मागेषु भक्तिकाः। निधाय सर्वगात्रेषु स्वर्गस्योपायनं व्यधुः ॥१६१३।। गंधोदकाभिषेकात विधायेति सुरेश्वराः। गंधोदकं च वन्दित्वा पूतं शुध्य जिनेशिनः ॥१४॥ व्यातुक्षी निर्मला स्रक : जयकोलाहलः समम् । . पुरितैः कलशः भक्ल्या सचूर्णध पारिभिः ॥१६१५३० . -nin+ran-in..--.-: -mi-ur- via --murariuirani- Fru n -:- - - - in
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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