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___ अध्याय : दसवां ]
[६०७ इसके सिवाय नमान पावताय के जन्म समय में भी इसी प्रकार का कथन है, सोही पार्श्वपुराण में लिखा है--
इत्थं गंधोदकः कृत्याभिषेक सुरनायकाः । शांति ते घोषयामासुरुच्च चाध शांतये ॥१९१६॥ चक्र : शिरसि भाले च नेत्रे सर्याम पुद्गले । स्थस्योपायनं पूतं तद्गंधांबु सुरास्त्रियः ॥१९१७॥ गंधांबुस्नपनस्याते जयनंदादि सत्स्वरैः । न्यातुक्षीम मराश्चन : सचूर्णगधवारिभिः ।।१६१८॥ इसलिये ऊपर लिखा हुआ लोगों का कहना अप्रत्य है।
तथा गर्भान्वय ग्रादि क्रियाओं में जो बालक की केशवाप (मुडन वा केश उत्तरवाना) क्रिया है, उसमें पहले देव शास्त्र गुरु की पूजा होती है, फिर बालक का मस्तक गंधोदक से भिगोयर जाता है, फिर केश उतारे जाते हैं, तदनंतर गंधोदक से ही बालक का स्नान कराया जाता है। ऐसा श्री जिनसेन स्वामी ने यादि पुराण के अडतीसवे पर्व में लिखा है----
केशवापस्तु केशानी शुभेहि व्यपरोपणम् । क्षौरेष कर्मणा देवगुरु पूजा पुरस्सरम् ||१६१६॥ गंधोदकादितान कृत्वा केशान् शेषाकृतोचितान् । . मोडयमस्य विधेयं स्यात्सचूलं धान्योचितम् ॥ स्नपनोदक धौतांगमनुलिप्सं सभूषणम् । प्रणमध्य मुनीन् पश्चाब् योजये धुलाशिषा ॥१६१२॥
इसके सिवान जब राजा श्रीपाल कोटी भट' कोढं रोग से पीडित हो गये थे और उनके साथ के सात सौ योद्धा भी कोंढ रोग से पीडित हो गये थे, तब श्रीपाल की रानी मैना सुन्दरी ने भगवान का गंधोदक लेकर उनके समस्त शरीर पर सींचा था और उसके सींचने से उन सबका कोढ रोग दूर हो गाया था । ऐसा कथन श्रीपाल चरित्र आदि शास्त्रों में लिखा है।
गंधोदक की महिमा जैन शास्त्रों में लिखी है, इसलिये इसमें संदेह नहीं करना चाहिये । तथा बिना समझे शास्त्र विरुद्ध वचन नहीं बोलना चाहिये। जो इस प्रकार कहते हैं, वह उनकी कबोल कल्पना है ।