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[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रश्न :- कौन सी प्रतिमा प्रतिष्ठा योग्य नहीं है, अर्थात् कैसी प्रतिमा की प्रतिष्ठा नहीं करनी चाहिये । तथा कैसी प्रतिमा प्रतिष्ठा करने योग्य है ?
उत्तर :-- - व्यंगित प्रतिमा ( जिसके अंग उपांग खंडित हैं) जर्जरी भूत प्रतिमा ( बहुत प्राचीन जो खिरती हो, जीर्ण-शीर्ण हो ) जिस प्रतिमा की प्रतिष्ठा पहले हो चुकी हो, जो दुबारा बनाई गई हो अर्थात् जिसके अंग भंग हो गये हो और फिर गडकर बनवाई गई हो और जिन प्रतिमांत्रों में संदेह हो ऐसी जिन प्रतिमाएँ प्रतिष्ठा करने योग्य नहीं है तथा जिस प्रतिमा की नाक, मुख, नेत्र, हृदय, नाभिमंडल यादि अंग भंग हो गये हों वह भी पूजा करने योग्य नहीं है । सो ही प्रतिष्ठा शास्त्र में लिखा है-
व्यंमित जर्जरां चैव पूर्व मेव प्रतिष्ठिताम् । पुनर्घटित संदिग्ध प्रतिमां मो प्रतिष्ठयेत् ॥१६११॥ नासा मुखे तथा नेत्र हृदये नाभि मंडले |
स्थानेषु तेषु प्रतिमां नैव पूजयेत् ॥ ११२ ॥
यहां पर फिर से बनाई गई प्रतिमा की प्रतिष्ठा का जो निषेध किया है । उसका अभिप्राय यह है कि जिस प्रतिमा के उपांग खंडित हो गये हों और फिर सुधार कर वह दुबारा बनाई गई हो तो ऐसी प्रतिमा की प्रतिष्ठा नहीं करानी चाहिये । तथा जो प्रतिमा शिल्पशास्त्रों में कहे हुए लक्षणों से सुशोभित हो और सांगोपांग हो ऐसी प्रतिमा की प्रतिष्ठा करना योग्य है । सो ही प्रतिष्ठापाठ में लिखा है
यद्विम्बं लक्ष र्युक्तं शिल्पि शास्त्र निवेदितम् ।
सांगोपांगं यथा युक्त या पूजनीयं प्रतिष्ठितम् ।। १६१३ ।।
प्रश्न :- जो प्रतिमा पूर्व प्रतिष्ठित है, उसका यदि उपांग ( उंगली आदि) खंडित हो जाय प्रथवा मस्तक होन हो जाय तो उसकी पूजा स्तुति का विधान किस प्रकार है ?
उत्तर :- जिस प्रतिमा की उंगली का अग्रभाग अथवा कुछ कान का भाग after हो तथा वह प्रतिमा पूर्व प्रतिष्ठित हो और अतिशय सहित हो तो वह प्रतिमा पूज्य है, ऐसी प्रतिमा की पूजा स्तुति नमस्कार श्रादि करने में अपने बुरे भाव नहीं
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