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अध्याय : दसवां ] करने चाहिये । यदि ऐसी प्रतिमा अतिशय रहित हो तो वह पूज्य नहीं है। तथा जो प्रतिमा मस्तक हीन हो तो उसको जलाशय में क्षेपण कर देना चाहिये । मस्तक हीन हो तो प्रतिमा को चैत्यालय में नहीं रखना चाहिये इस प्रकार नरेंद्र सेन कृत प्रतिष्ठा दीपक में लिखा है । यथा--
जीर्ण चालिशयोपेतं तदध्यंगमपि पूजयेत । शिरोहीनं न पूज्यं स्याग्निक्षेप्यं तन्नदादिषु ।।१९१४॥
इस प्रकार जानना । यदि इसका विशेष स्वरूप जानना हो तो जिन संहिता प्रतिष्ठा पाठ सरस्वती कल्प पूजासार शिल्पशास्त्र आदि ग्रंथों से जान लेना चाहिये । प्रश्न :-इस पंथम काल में भरत क्षेत्र में साक्षात् केवलशानी नहीं है, फिर
भला उनको किस प्रकार मानना चाहिये और उनकी पूजा भक्ति किस प्रकार करनी चाहिये। उनकी प्रतिमा की स्थापना निक्षेप..
रूप है, साक्षात् नहीं है ? . उत्तर :--- केवली भगवान की वाणी का पठन-पाठन करने वाले प्राचार्य हैं, इसलिये प्राचार्य को मानना व उनकी पूजा भक्ति आदि करना साक्षात् केवली को मानने और उनकी पूजा भक्ति करने के समान है, क्योंकि जिसने केवली प्रणीत शास्त्रों पठन-पाठन करने वाले मान लिये तो उसने साक्षात् केवली भी मान लिये । इस पंचमकाल में श्री महावीर स्वामी के पीछे जिन सूत्रों के पठन-पाठन करने वाले और रत्नत्रय को धारण करने वाले अनेक बड़े-बड़े प्राचार्य हुए हैं, उनके वचनों की आज्ञा. मानना ही केवली भगवान को मानना है। सो ही श्री पद्मनन्दी विरचित पद्मनंदी पंच- विशतिका में लिखा है-~
संप्रत्यस्ति न केवली किल कलौत्रैलोक्यचूणामणिस्तहमः । परमासतेऽत्र भरत क्षेत्र जगद्धोतिका ॥ सद्रत्नत्रय धारिखो . यतिवरास्तासां... समालवनं । . तत्पूजा जिनवाचि पूजनमतः . सामाज्जिनः पूजितः ॥१६१४॥
इससे सिद्ध होता है कि प्राचार्यों को मानने में उनकी पूजा. भक्ति करने में और उनके वचनों की आज्ञा मानने में कोई संदेह नहीं करना चाहिये । जो पुरुष प्राचार्यों की प्राज्ञा मानने में संदेह करते हैं, वे केवली भगवान का अविनय करते हैं।