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[ गो. प्र. चिन्तामरिंगदेव पहले सौधर्म इन्द्र वाले कर मार इकट्ठे हुए थे, फिर वहां से सब मिलकर भगवान की जन्मपुरी में आये थे ऐसा सोमसेनकृत लघु पद्मपुराण के ग्यारहवें अधिकार में मिला है...
सेन्द्राश्च व्यंसराः सर्वेभवनवासिनस्तथा। ज्योतिषाः सपरिवारा नाना यानश्च संयुताः ।।१९०२॥ सौधर्मेन्द्र गहे द्वारं संप्राप्ता विभवान्विताः ।। तथा षोडश स्वर्गस्थ देयास्तत्र समागताः ॥१६०३॥
इस प्रकार वर्णन है । इससे भी सिद्ध होता है कि भवनत्रिक पहले स्वर्ग तक जा सकते हैं। ... प्रश्न:-- इस समय इस पांचवें काल में रत्नत्रय को धारण करने वाले मुनि
अपने उत्कृष्ट भावों से स्वर्गलोक में जाते हैं सो कौन से स्वर्ग तक
जा सकते हैं ? उत्तर:--पांचवें काल के भाव लिंगी और रत्नत्रय को धारण करने वाले मुनि इन्द्र पदवी पाते हैं तथा पांचवें ब्रह्मलोक स्वर्ग में लोकांतिक देवों की पदवी को पाते हैं तथा वहां से प्राकर मनुष्य होकर मोक्ष जाते हैं, इससे सिद्ध होता है कि पांचवें काल के मुनि पांचवें स्वर्ग तक जाते हैं. । सो ही मोक्षप्राभूत में लिखा है--
अज्जवि तिरयण सुद्धा अप्पा झाए विलहई इन्दत । लोयन्तिय देवत्तं तत्थ धुश्रा सिव्वुदि जति ॥१६०४॥
इससे यह भी सिद्ध होता है कि पांचवें काल में भी जीवों को ऐसी ही शक्ति होती है । प्रश्नः-- भगवान के समवशरण में जो मानस्तम्भ प्रादि होते हैं, उनकी
ऊंचाई का प्रमाण किस प्रकार है ?
उत्तरः-समवशरण के मानस्तम्भ, ध्वजास्तम्भ, चैत्यवृक्ष, सिद्धार्थवृक्ष, स्तूप, तोरण, कोट, गृह, वनवेदिका, वन, पर्वत आदि को अंचाई भगवान तीर्थंकर की "ऊंचाई से बारह गुरणी होती है।
___ भावार्थ- भगवान के शरीर की जितनी ऊंचाई होती है, उससे बारह.गुणी इन सवक्री समझ लेना चाहिये । सो ही सकलकीर्ति विरचित्त प्रादि पुराण में लिखा
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