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________________ अध्याय : दसवां ] [ १०३ यहां पर क्षीद्र शब्द का अर्थ इक्षु दा ईख का है । सिद्धांतसार प्रदीपक में भी लिखा है-- कालोदे पुष्कराम्भोधौ स्वयंभूरमरणार्णवे । केवलं जलसुस्थादं जलौधं च भवेत्सदा ॥१८६६॥ . क्षीराब्धौ क्षीरसुस्वादुं सनेसांभो भवेन्महत । घृतस्वादसमस्निग्धं जलं स्याघृतवारिधी ।।१८९७॥ एतेभ्यः सपूर्वाधिभ्यः परें संख्यात सागराः । भवंतीक्षुरसस्वाद समाना मधुराः शुभाः ॥१६॥ प्रश्न-भवनवासी ब्यंतर और ज्योतिष्क ये तीन प्रकार के देव भवनत्रिक कहलाते हैं, ये तीनों प्रकार के देव अपनी शक्ति के द्वारा ऊपर की ओर कहाँ तक गमत कर सकते हैं, तीर्थङ्कर के जन्माभिषेक के समय पांडकशिला तक तो ये देव जाते हो हैं, परन्तु इसके ऊपर जा सकसे या नहीं ? उत्तर- ऊपर लिखे हुए ये तीनों प्रकार के देव अपनी इच्छा से सौधर्म स्वर्ग तक गमन कर सकते हैं। सौधर्म स्वर्ग से ऊपर वे अपनी इच्छा से गमन नहीं कर सकते, यदि स्वर्गों में रहने वाले देव इनको प्राकर ले जाय तो उनके ले जाये गये जा सकते हैं । परन्तु इस प्रकार ले जाये गये भी सोलहवें अच्युत स्वर्ग तक ही जा सकते हैं, सो भी अपनी शक्ति से नहीं तथा सोलहवें स्वर्ग से पाये दूसरे देवों के द्वारा ले जाने पर भी जा सकते । यह नियम हैं, सो ही सिद्धान्तसार दीपक में चौदहवीं सन्धि में लिखा है-- कियामात्रोधिस्तेषामघोलोकेऽपि जायते । भावना व्यंतरा ज्यतिका गच्छन्ति स्वयं क्वचित ।। १८६६।। तृतीयक्षिति पर्यन्तमधोलोके स्वकार्यतः । सौधर्मशान कल्पांतमूर्यलोके निजेच्छया ॥१६००॥ तेऽपि सर्व सुरैनीता भावनाद्यास्त्रयोऽनराः । षोडश स्वर्गपर्यंतं प्रीया धांति सुखाप्तये ॥१६०१॥ देव लोम तीर्थंकरों के जन्म के समय में आते हैं सो मुनिमुक्त के जन्म समय में चार प्रकार के देव पाये थे उनमें से भवनवासी, व्यन्सर, ज्योतिष्क प्रादि सब
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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