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। गो. प्र. चिन्तामरिग वतीस जन्म-मरण होते हैं। इनमें पहले के अस जीवों के छह स्थानों के २०४ जन्म मरण मिला देने से सब मिलकर ६६३३६ भेद हो जाते हैं । ये सब संसारी जीवों के क्षुद्र भव हैं । सो ही गोम्मट्टसार में लिखा है--
सीदीसट्ठीताल वियलं चउवीस होति पंचक्खे । छावट्टि च सहस्सा सयं च वत्तीस मेयरखे ॥१८६२।। पुढवीगामरिणमारद साहारण थूल सुहमपलया। एदेसु अघुरणेया इक्केक्के वारकं छक्कं ॥१८६३॥
इस प्रकार एक श्वास के अठारहवें भाग आयु के प्रमाण से एक अन्तर्मुहर्त में सत्रह स्थानों में यह संसारी जीव मिथ्यात्व के उदय. से सर्वोत्कृष्ट क्षुद्रभव ६६३३६ धारण करता है। प्रश्न---लवरसोयधि, कालोदधि और अन्त के स्वयंभूरमण समुद्र के जल का
स्वाद तो खारे जल के समान है, परन्तु बाकी के असंख्यात समुद्रों
के जल का स्वाद कैसा है ? उत्तर-ऊपर कहे हुए तीन समुद्रों के सिवाय बाकी के असंख्यात समुद्रों के जल का स्वाद ईख के रस के समान मीठा और स्वादिष्ट है । प्रश्न- ईख के रस के समान भीठा जल तो इक्षुवर समुद्र का है, परन्तु यहाँ
पर सब समुद्रों का जल ऐसा भीठा कैसे कहा ? तथा क्षीरोदधि समुद्र का जल तथा घृतोदधि समुन्न का अल जुदे तरह का ही
बतलाया है, इसलिये सबका एक सा स्वाद कैसे कहा ?
उत्तर-क्षीरोदधि तथा धृतोदधि आदि समुद्रों के जल का स्वाद नहीं बतलाया है, किन्तु उसका वर्ण बतलाया है । स्वाद तो सबका ही ईख के समान मीठा है । सोही त्रिलोकसार में लिखा है
लवणं वारुणि तिय मिदि काल दुर्गतिलयंभुरमणमिदि । पत्तेय अलसुवादा अबसेसा होति इच्छुरसा ॥१८६४॥ यही बात मूलाचार के बारहवें अधिकार में लिखी है--- पले घरसा चत्तारि सायरा तिगिरण होति उदयरसा। अवसेसा य समुद्धा रखोदरसा होति गायम्वा ॥१८६५॥
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