________________
अध्याय : दसवां ]
[ १०१ पांच भावेन्द्रियों से त्याग किया जाता है इसलिये १० गुणा करने से २७० भेद होते हैं। इनका त्याग चार संज्ञानों से किया जाता है सो २७० को ४ से गुरणा करने से १०८० भेद होते हैं। इनका त्याग १६ कषायों से किया जाता है, इसलिये १६ से गुणा करने से १७२८० सत्रह हजार दो सौ अस्सी भेद होते हैं । ये चेतन स्त्रियों के त्याग के भेद है, इनमें प्रचेतन स्त्रियों के त्याग ७२० भेद से मिलाने से.१८००० भेद हो जाते हैं।
ये सब भेद स्वामी कातिकयानुप्रेक्षा. को टीका से लिखे हैं । तथा एक ही कथन को दो बार लिखा है । सो स्पष्टता के लिये लिखा है।
प्रश्न----यह जीव संसार में एक अन्तर्मुहूर्त में भव के उत्कृष्ट जन्म-मरण
कितने करता है ?
उत्तर--यह संसारी आत्मा कम से कम एक श्वास के अठारहवें भाग आयु पाता है तथा अपर्याप्त नाम कर्म के उदय से एकेन्द्रियादि सत्रह स्थानों में एक अन्तमुहूर्त समय में छियासठ हजार तीन सौ छत्तीस बार जन्म-मरण करता है, सा हा स्वामी कातिकेयानुप्रीक्षा में लिखा है----
उस्सासद्वारसमे भागे जो मरदि ग य समारणेदि ।
एका वि य पज्जत्ति लखीय पुरषो हवे सो दु ॥१८६०॥ .. सो ही गोम्भट्टसार में लिखा है--
तिष्णिसया छत्तीसा छावट्टी सहस्सगाणि मरणारिण । अन्तोमुत्तकाले तावदिया चेव खुद्दभवा ।।१८६१॥
इसका विशेष स्वरूप इस प्रकार है-दो इन्द्रिय के ८० भव, ते इन्द्रिय के ६०, चौ इन्द्रिय के ४०, पंचेन्द्रिय के २४ । इन पंचेन्द्रिय के २४ भवों में भी तीन भाग हैं। तहां मनुष्यों में लध्यपर्याप्त के भव ८, संनी पंचेन्द्रियं लब्ध्यपर्याप्ति के ८ भव तथा असंज्ञी पंचेन्द्रिय लध्यापयर्यास्त के ८ भव इस प्रकार अस जीवों के सब मिलाकर २०४ जन्म-मरण होते हैं । तथा पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और साधारण वनस्पति कायिक इन पांचों के स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दस भेद होते हैं । तथा प्रत्येक बनस्पति का एक स्थूल ही भेद होता है । इसके दो भेद नहीं होते । ये सब ग्यारह भेद होते हैं, इनमें प्रत्येक के छह हजार बारह जन्म-मरण होते हैं, इसलिये ग्यारह प्रकार के स्थावर जीवों के जन्म-मरण के छयासठ हजार एक सो