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[ गो. प्र. चिन्तामणि शान, दया और अमा ये सात गुरण गृहस्थों के होते हैं। इस वर्णन में संतोप के बदले शक्ति और सत्य के बदले दया का उल्लेख हुअा है। पुरुषार्थसिद्धयुपाय. में अमृतचन्द्र सूरि ने दाता के निम्नलिखित सात गुणण लिखे है—१. ऐहिक फल की अपेक्षा नहीं करना, २. शान्ति, ३. निष्कपटता, ४. अनसूया-ग्रन्यदातारों से ईर्ष्या नहीं करना; ५. अविषादित्व, ६. मुदित्व और ७. निरहंकारित्व । इस वर्णन में शाति-क्षमा को छोड़कर सभी नवीन गणों का समावेश हुअा है। .. प्रश्न :-दान देने का क्या फल है ? . .
... उत्तर :--निश्चय से जिस प्रकार जल खून को धो देता है, उसी प्रकार गृह रहित-निग्रन्थ मुनियों के लिए दिया हुग्गा दान गृहस्थी सम्बन्धी कार्यों से उपजित अथवा मुद्रढ़ कर्म को भी नष्ट कर देता है ।
गृह कर्मपाय निचिक मिल गहमिसानाम् । नतिथानां प्रतिपूजा रूधिमलं धावते. बारि
... जिन्होंने अन्तरंग और बहिरंग से घर का त्याग कर दिया है, तथा सब तिथियाँ जिन्हें एक समान हैं, किसी खास तिथि से राग-द्वेष नहीं है, ऐसे मुनियों के लिये जो दान दिया जाता है, वह सावध व्यापार-सपाप कार्यों से संचित बहुत भारी कर्म को भी उसी तरह नष्ट कर देता है, जिस तरह कि जल, मलिन रुधिर को धी देता है-नष्ट कर देता है।
विशेषार्थ :-गृहस्थ का जीवन ऐसा जीवन है कि इसमें हिंसा के कार्य अवश्य होते हैं। जैसे उनली से धान आदि को कटनां, यकी से गहूँ आदि को पीसना, चूल्हा जलाना, पानी के घट भरना और बुहारी से भूमि को झाड़ना तथा व्यापार के लिये खेती अदि करना । इन सब कामों में गहस्य के निरन्तर पाप कर्मों का संचय होता रहता है । इस संचय के होते हुए भी यदि गृहस्थ परमार्थ से गृह के त्यागी मुनियों के लिये दान देता है, तो उससे उत्पन्न हुआ पुण्य उस संचित कर्म को उसी तरह शीत्र नष्ट कर देता है । जिस प्रकार कि पानी मलिन तथा अपवित्र खून को धो डालता है नष्ट कर देता है।
प्रश्न :- नवधा भक्ति करने से क्या फल होता है ?
उत्तर :--तप के भाँडार स्वरूप मुनियों को नमस्कार करने से उच्य गोत्र, पाहारादि दान देने से भोग, प्रतिग्रहण आदि करने से सम्मान, भक्ति करने से सुन्दर रूप और स्तुति करने से सुयश प्राप्त किया जाता है ।
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