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संध्याय : पांचवां
| १६७ जीवघात के स्थान को सूना कहते हैं । संक्षेप से सूना के पांच भेद हैं । जैसा . कि. कहा गया है-खण्डनोति खण्डनी-उखली से कूटना, गेषरणी चक्की से पीसना, चुल्लो--. चला सिलगाना, उदकुम्भ-पानी के घट भरना और प्रमार्जनी-बुहारी से भूमि को बुहारना ये पाँच हिंसा के कार्य गृहस्थ के होते हैं. अतः वह मोक्ष को प्राप्त नहीं होला । खेती यादि व्यापार सम्बन्धी कार्य प्रारम्भ कहलाते हैं। जिनके मूना और प्रारम्भ नष्ट हो चुके हैं ऐसे सम्यग्दर्शनादि गणों से सहित मुनियों का आहार आदि दानं के द्वारा जो गौरत्र या आदर किया जाता है, वह दान कहलाता है । यह दान सात गुणों से सहित दाता के द्वारा दिया जाता है। जैसा कि कहा गया है.-- श्रद्धेति श्रद्धा, संतोष, भक्ति, विज्ञान, अलुब्धता, क्षमा और सत्य ये सात गुण जिसके होते हैं, उस दाता की प्रशंसा करते हैं। इन सात गुणों के सिवाय दाता को शुद्ध भी होना चाहिये । दाता की शुद्धता का विचार तीन प्रकार से किया जाता है-कुल से, प्राचार मे और शरीर से ! जिसकी वंश परम्परा शुद्ध हो उसे कुल शुद्ध कहते हैं, जिसका आचरम शुद्ध हो उसे आचार शुद्ध' कहते हैं और जिसने स्नानादि कर शुद्ध वस्त्र ... धारण किये हैं, अंग भंग नहीं है, तथा जिसके शारीर में हधिरादिक को कराने वाली कोई बीमारी नहीं है, उसे शरीर शुद्ध कहते हैं। यह दान नव प्रकार के पुण्योपार्जन के कारणों के साथ दिया जाता है । जैसा कि कहा गया है—पडिगर्मिति पंडिगाहना, उच्च स्थान देना, पाद प्रक्षालन, पूजन, प्रणाम, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि और एपग-पाहार गुद्धि ये नव पुण्य कहलाते हैं 1 इन्हीं को नवधा भक्ति कहते हैं।
विशेषार्थ : - इस श्लोक में दान, दाना, पान और दान की विधि बतलाई - गई है। पान को देखकर उसके प्रति जो प्रादर प्रकट किया जाता है, वह दान कहलाता है । जो श्रद्धा आदि सात गुणों से सहित हो तथा शुद्ध हो उसे दाता कहते है । जो चक्की, चूला अादि घर सम्बन्धी तथा खेती आदि व्यापार सम्बन्धी प्रारम्भ से रहित हो. ऐसे रत्नत्रय के धारक मुनि ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका तथा नायिका यादि. पान कहलाते हैं और नवधा भक्ति को दान की विधि कहते हैं। दान देते समय इन . सबका विचार रखना चाहिये । दाता के सात गुणों का वर्णन कई प्रकार का मिलता है । एक वर्णन संस्कृत-ठीका में उदधुत 'श्रद्धा तुष्टि प्रादि यलोक के आधार पर टीकार्थ. में किया जा चुका है। दूसरा वर्शन संस्कृत टीका की 'घ' प्रति में उद्धत 'श्रद्धा शक्ति'-ग्रादि श्लोक के आधार पर इस प्रकार है-श्रद्धा, शक्तिः, अलुब्धता, भक्ति, . .