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[ गो. प्र. चिन्तामणि व्यापत्ति व्यपनोदः पदयोः संवाहनं च गुणरागात् ।
वैयावृत्यं यावानुपग्रहोऽन्योऽपि . संयमीनाम् ॥६७।.. .. देशवती और सकालनती के भेद से संयमी दो प्रकार के हैं। इनके ऊपर यदि बीमारी आदि नाना प्रकार की आपत्तियां पाई हैं, तो उन्हें गुणानुराग से प्रेरित होकर दूर करना, उनके पैर आदि अंगों का मर्दन करना तथा इसके सिवायः और भी जितनी कुछ समयानुकल सेवा है, वह सब वैयावृत्य नामक शिक्षागत है । यह वैयावृत्य । व्यवहार अथवा किसी दृष्ट फल की अपेक्षा से न होकर मात्र गुरणानुराग अर्थात् भक्ति के वश से की जाती है ।
... विशेषार्थ :-मुनियों के योग्य छह अन्तरंग तपों में एक बयावृत्य नाम का सब है । जिसका अर्थ होता है, बालक, वृद्ध अथवा ग्लान-मरण अादि मुनियों की सेयश : ... कर उन्हें मार्ग में स्थिर रखना । परस्पर की सहानभूति की प्रवृत्ति से ही चतुर्विध मुनि
संघ का निर्वाह होता है । प्राचार्य, उपाध्याय. तपस्वी, शैश्य, ग्लान, गगा, कुल, संब, साधु और मनोज इन दस प्रकार के मुनियों का वैयावृत्य नाम का शिक्षाक्त रखा ? गया है । गृहस्थ को चाहिये कि उसके नगर में यदि किसी देशवती या महायती के अपर कोई कष्ट पाया है, तो उसे पूर्ण तत्परता के साथ दूर करें। इस वैयावृत्त्य । शिक्षाव्रत में सभी दानों का समावेश होता है । अयावृत्य करते समय किसी प्रकार की ग्लानि या मान-अपमान का भाव नहीं रखना चाहिये, क्योंकि स्वार्थ बुद्धि से किया हुआ दौयावृत्य धर्म का अंग नहीं होता। सेवा को प्रवत्ति भी कहा है, और परमधर्म भी कहा है । जब सेवा किसी स्वार्थ बुद्धि से की जाती हैं, तब श्ववृत्तिकुकुरवृत्ति कहलाती है और जब निःस्वार्थ भाव से की जाती है, तब परम धर्म। कहलाती है-कर्म निर्जरा का कारण मानी जाती है। . प्रश्न :-दान किस को कहते हैं ? . .
उत्तर :---सात गुणों से सहित और कोलिक, प्राचारिक तथा शारीरिक शुद्धि मे सहित गृह सम्बन्धी कार्य तथा खेती आदि के प्रारम्भ से रहित, सम्यरदर्शनादि गुणों से सहित मुनियों का नवधा भक्ति पूर्वक जो ग्राहारादि के द्वारा गौरवः । किया जाता है, वह दान माना जाता हैं।
नव पुण्यः प्रतिपत्तिः सप्तगुण समाहितेन शुद्धने । अपनारम्भारणामार्यारणामिप्यते . दानम् ॥६॥
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