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________________ Searn . .." MKARAN TRAINMESH RRESS अध्याय : पांचवा ] [ १६५ तप ही जिनका धन है, तथा सम्यग्दर्शनादि गुरषों के जो निधि आश्रय हैं, ऐसे भाव आगार और द्रव्य प्रागार से रहित मुनीश्वर के लिये उपचार-प्रतिदान तथा उपक्रिया-प्रत्युपकार की भावना से रहित अपनी ब्रिधि, द्रव्य आदि सम्पदा के अनुसार जो साहार. आदि का दान दिया जाता है, वह वयोवृत्य कहलाता है । . विशेषार्थ:-ज्यावृत्तिः, दुःख . निवृत्तिः प्रयोजनं यस्य तत् वैयांवत्यं' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दुःख निवृत्ति जिसका प्रयोजन है, उसे वैयावृत्य कहते हैं । अन्य प्राचार्यों ने वैयावत्य के स्थान पर अतिथिसंविभाग शब्द रखा है। अतिथिसंविभाग व्रत जिस प्रकार अतिथि के लिए दान की प्रधानता है, उसी प्रकार वैयावृत्य में भी दान की प्रधानता है, क्योंकि साहार आदि दान के द्वारा अतिथि की दुःख निवृत्ति का प्रयोजन सिद्ध होता है । फिर अतिथिसंविभाग शब्द को परिवर्तित करने का प्रयोजन क्या है ? यह प्रश्न उठता है । उसका उत्तर यह है कि अतिथिसंविभाग शब्द में मात्र चार प्रकार के दानों का समावेश होता है, उसके अतिरिक्त संयमीजनों की जो सेवा-सुश्रुषा है, उसका समावेश नहीं होता । परन्तु वैयावृत्य शब्द में दान ओर सेवा-सुश्रुपा सबका समावेश होता है । इसलिये समन्तभद् स्वामी ने. 'वैयावृत्य' - इस व्यापक शब्द को स्वीकृत किया है। · दान देते समय पात्र का विचार करना नावश्यक है। इस लिये पान का विचार करते हुए ग्राचार्य ने तीन विशेषण दिये हैं-'तपोधनाय 'गुणानिधये' और का ‘अग्रहाय' पात्र वहीं हो सकता है जो तपस्वी हो, सम्यग्दर्शनादि गुणों का आधार हो । और गृह त्यागी हो । दान देते समय यही एक उद्देश्य होना चाहिये कि इससे रत्नग्र रूप धर्म की वृद्धि हो । दान के बदले मुनीश्वर हमें कुछ देवे अथवा मन्त्र, तन्वं मादि के द्वारा हमारा कुछ प्रत्युपकार करें ऐसी भावना नहीं रखना चाहिये । इसके सिवाय दान अपने विभव सामर्थ्य के अनुसार देना चाहिये, क्योंकि सामर्थ्य का उलङ्घन.. कर जो दान दिया जाता है, वह संक्लेश का कारण होता है 1 .... प्रश्न :---वैयावृत्य माने क्या ? . उत्तर :---सम्यग्दर्शनादि गुणों की प्रीति से देशद्रत और सकल व्रत के धारक . संयमी जनों की पाई हुई नाना प्रकार की आपत्ति को दूर करना, पैरों को उपलक्षण से हस्तादिक अङ्गों का दवाना और इसके सिवाय अन्य सी जितना उपकार है, वह सब वैयावृत्य कहा जाता है । . RAT BRSTA
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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