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________________ १६४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणिः तोनों के साथ होता है. इसलिए अष्टमृष्ट ग्रहण अतिचार उसके होता है, जो भूख से पीड़ित होकर अर्हन्त आदि की पूजा के उपकरण तथा अपने वस्त्र ग्रादि विना देखें, बिना शोधे ग्रहण करता है। अदृष्टः मृष्ट विसर्ग अतिचार उसके होता है, जो भूख से पीड़ित होने के कारण विना देखी, विना शोधी भूमि में मलमूत्र छोड़ता है, और अदृष्ट मृष्टास्तरण अतिचार उसके होता है. जो भूख से पीड़ित होने के कारण विना देखे, बिना शोधे स्थान पर बिस्तर बिछाता है। इन तीनों के सिवाय अनादर, अस्मरण ये दो अतिचार और होते हैं। जिसमें अनादर का अथी है, भूख से पीड़ित होने के कारण आवश्यक कार्यों में पादर नहीं करना अर्थात् उन्हें उपेक्षा भाव से करना और.. अस्मरगा का अर्थ है अनेकाग्रता अर्थात् चित्त में एकाग्नता का नहीं होना । ... . . विशेषार्थ---तत्त्वार्थमूत्रकार ने भी इस अत के ये ही पांच अतिचार बतलाये । हैं, मात्र शब्दों में अन्तर है, भाव में नहीं। जैसे- १. अप्रत्यवेक्षिता प्रमाजितोत्सर्ग, २. अप्रत्यवेक्षिता प्रमाजितदान, ३. अप्रत्यवेक्षिता प्रमाणित संस्तरोपक्रमरण, ४, अनादर और ५. अस्मरण । अनादर और प्रस्मरण ये दो अतिचार सामयिक शिक्षाअत में भी नाते हैं । वहां सामयिक से सम्बन्ध है, यहां प्रोषधोपवास से सम्बन्ध हैं। अनादर का एक अर्थ यह भी उचित जान पड़ता है. कि कोई व्यक्ति उपवास तो करता है, परन्तु अनादर-अनुत्साह पूर्वक करता है। जैसे-ग्रीष्म ऋतु में उपयास की शक्ति क्षीण हो जाने से कोई प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए उपवास करता है, उत्साह पूर्वक नहीं । इसी प्रकार अस्मरण का एक अर्थ बह भी उचित जान पड़ता है कि पर्व के दिन का स्मरण नहीं रखना । जैसे-अष्टमी, चतुर्दशी के निकल जाने पर कोई. किसी से पूछता है कि आज. अष्टमी तो नहीं है? चतुर्दशी तो नहीं है ? इस तरह समयान्तर में पूर्व के दिन का . उपवास करता है। प्रश्न : वैयावृत्य शिक्षावत का लक्षण क्या है ? : उत्तर :--- (तपोधनाय) तपरूप धन से युक्त तथा सम्यग्दर्शनादि गुणों के भण्डार गृह त्यागी-मुनीश्वर के लिए विधि, द्रव्य - प्रादि सम्पत्ति के अनुसार प्रतिदान और प्रत्युपकार की अपेक्षा से रहित , धर्म के निमित्त जो दान दिया जाता है, वह वैयाबृत्य कहलाता है। दानं वैयावृत्यं धर्माय तपोधनाय गुणनिधये । अनपेक्षितोपचारोपनियमगृहाय विभवेन ॥६६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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