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________________ - D - अध्याय : पांचवां । पारणा के दिन एकाशन करने की चर्चा नहीं है । यहाँ इस श्लोक में धारणा और . पारणा के दिन एकाशन की भी चर्चा की गई हैं 1 जान पड़ता है कि समन्तभद्र स्वामी ने इस श्लोक में किसी अन्य मान्यता का उल्लेख किया है । धारणा के दिन एकाशन करने की चर्चा तो पुरुषार्थसिद्धयुपाय में अमृतचन्द्र स्वामी ने भी की है। उन्होंने प्रोषधोपचास के १६ पहरों का विवरण देते हुए लिखा है कि उपवास के पूर्व दिन मध्याह्नका भोजन करने के बाद उपवास का नियम लेकर एकान्तवसतिका में चला जाना चाहिये । इस संदर्भ में उन्होंने तृतीय दिन के मध्याह्न तक का कार्य विवरण दिया है । इससे सिद्ध होता है कि धारणा के दिन एकाशन किया जाता था । परन्तु पारणा के दिनं एकाशन की चर्चा अन्यत्र देखने में नहीं आयी । इस श्लोक में प्रारम्भ का अर्थ संस्कृत टीकाकार में सकृद्मुक्ति किया है । प्रारम्न का अर्थ सकृद्भुक्ति' करो हो गया, यह शुद्धि में नहीं आता । प्रारम्भ का अर्थ प्रारम्भ ही है। उपवास के पूर्व दिन मध्याह्न के भोजन के बाद उपवास का नियम लेकर 'मुक्त समस्तारम्भ' हया अब सोलह पहर के बाद वह आरम्भ-गृहस्थी के अन्य कार्य करने के लिये स्वतन्न हो जाता है । यह अर्थ प्रसंगानुसार संगत प्रतीत होता है। वर्तमान में उपवास के तीन हा प्रचलित हैं...-१. सोलह पहर का, २, बारह पहर का और ३, पाठ पहर का । सोलह पहर का उपवास पूर्व दिन के मध्याह्न के भोजन के बाद शुरू होता है, और तृतीय दिन के दोपहर तक चलता है । बारह पहर का उपवास पूर्व दिन्न के शाम के भोजन के बाद शुरू होता है, और तृतीय दिन के मूर्योदय तक चलता है। ग्नौर गाठ , पहर का उपवास सूर्योदय के समय से लेकर आगमी दिन के सूर्योदय तक चलता है। प्रश्न :-प्रोषधोपवास के अतिचारों का क्या स्वरूप है ? उत्तर : ...जो बिना देखे तथा बिना बोधे पूजा आदि के उपकरणों को हरा करना, मल मूत्रादि को छोड़ना और संस्तर आदि बिछाना तथा अनादर और अस्मरण हैं, वे प्रोषधोपवास व्रत के पांच अतिचार हैं। ग्रहणविसर्गा स्तरणान्य दृष्टमष्टान्यनादरास्मरणे । यत्प्रोषधोपवास व्यतिलङ्घनपञ्चक । तदिदम् ।।६.५॥ यहाँ जीव-जन्तु हैं या नहीं, इस प्रकार चक्षु से देखना दृष्ट' कहलाता है, और कोमल उपकरगा से प्रमार्जन करना मृष्ट कहलाता है । जिसमें ये दोनों न हों, उसे ग्राष्ट पृष्ट कहते हैं । अदृष्ट भृष्ट शब्द का सम्बन्ध ग्रहण, विसर्ग और प्रास्तरण इन T
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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