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[ गो. प्र. चिन्तामणि
निवृत्ति है और शरीर में भी जब मूर्छा-ममता भाव से रहित है, तब परिग्रह से निवृत्ति स्वतः सिद्ध है । इस प्रकार समस्त हिंसादि पापों से रहित बह प्रोपधोपवास करने वाला व्यक्ति उपचार से महावती अवस्था को प्राप्त होता है। परन्तु प्रत्याख्यानावरण नाम का चारित्र मोह का उदय रहने के कारण वह संयम के स्थान को प्राप्त नहीं होता है।
प्रश्न :--प्रोषधोपदास का क्या लक्षण है ?
उत्तर :--- चार प्रकार के आहार. का त्याग करना उपवास है। एक बार भोजन करना प्रोप्रध है और उपवास करने के बाद पारणा के दिन एक बार भोजन करना वह प्रोषधोपवास है ।।
चतुराहार विसर्जनमुपवासः प्रोषधः सद्भुक्तिः ।
स प्रोषधोपवासो यदुपोष्यार समाचरति ॥६४॥ : ... .. . ... - अशन, पान, खाद्य और लेहा के भेद से ग्राहार चार प्रकार का होता है। भात मूग आदि अशन कहलाते हैं, छांछ यादि पीने योग्य पदार्थ पान कहलाते हैं, लाडू ग्रादि खाद्य पदार्थ हैं और खड़ी आदि चांटने योग्य पदार्थ ले ह्य कहलाते हैं । इन चारों प्रकार के ग्राहार का त्याग करना उपवास कहलाता है। एक बार भोजन करना प्रोषध कहलाता है और धारणा तथा पारसा के दिन एकासन के साथ पर्व के दिन जो. उपचास किया जाता है, वह प्रोषधोपनास कहलाता है । 'प्रोप्रवाश्यां धारण कपारणकदिने सकृद्भुक्तिभ्यां सह उपवासः प्रोषधोपवासः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार धारणा और पारणा के दिन एकाशन करते हुए अष्टमी तथा चतुर्दशी को उपवास करना । प्रावधोपवास कहलाता है।
विशेषार्थ :---श्री समन्तभद्र स्वामी प्रोषधोपवास का लक्षारण इस परिच्छेद के १६वें श्लोक में लिख्ख चुके हैं और बाद के श्लोकों में उपवास को दिन न करने योग्य तथा करने योग्य क्रियानों का वर्णन कर चुके हैं। अब इस श्लोक में उन्होंने पुनः . उपवास, प्रोषध और प्रोषधोपत्रास का लक्षण लिखा है जो कि पुनरुबत सा प्रतीत होता है । यहाँ उपवास का लक्षण तो वही है, जो कि १६ श्लोक में लिखा है, परन्तु प्रोमध का लक्षण अतिरिक्स लिखा है और प्रोषधों के साथ जो उपवास है, उसे प्रोषधोपवास कहा है । अन्य ग्रन्थों में प्रोषध का अर्थ पर्व अप्टमी चतुर्दशी लिखा है । अंतः पर्व के दिन किया हुआ उपवास प्रोषधोपवास कहलाता है । वहाँ धारणा और