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________________ अध्याय : [ १६१ रूपी अमृत को स्वयं पीवे अथवा दूसरों को पिलावे अथवा सालस्य रहित होता हुआ जान और ध्यान में तत्पर होवे । धर्मामृतं सतृष्णः श्रवणाभ्यां पिबतु पायद्वान्यान् । ज्ञान ध्यान परो वा भवतूपयसन्नतन्द्रालुः ॥३॥ समस्त प्राग्गियों के संतोष का कारण होने से धर्म को अमृत कहा है। उपवास करने वाला व्यक्ति यदि धर्म का विशेष ज्ञाता नहीं है, तो वह बड़ी उत्सुकता- . पूर्वक दूसरे विशिष्ट ज्ञानी जनों के मुख से होने वाले धर्मोपदेश को अपने कानों से सुने और यदि स्वयं विशिष्ट ज्ञानी है, तो वह दूसरों को धर्मोपदेश सुनाये । इसके . अतिरिक्त आलस्य को जीतता हुआ स्वयं ज्ञान और ध्यान में तत्पर रहे । स्वाध्याय में लीन रहता हुआ अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, शुचित्व, प्रास्त्रब, संवर, निर्जरा, लोक, बोधि दुर्लभ और धर्म इन बारह भावनाओं के चिन्तन में दत्तचित्त रहे । अथवा ग्राज्ञाथिचय, अपायविचय, विपाकविच्य और संस्थानविय इन चार धर्मध्यान में तत्पर रहे। विशेषार्थ :-..-उपवास के पूर्व दिन में मध्यान्न का भोजन करने के बाद उपवास का नियम लेकर सब प्रकार के प्रारम्भ का त्याग करना चाहिये । यहां तक कि शरीरादिक में भी ममत्वभाव नहीं रखना चाहिये । एकान्त बसतिकाल में जाकर : समस्त पाप पूर्ण योग का त्याग करे, समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत हो और . मनोगुप्ति, बचनगुप्ति, कायगुरित का पालन करता हुआ रहे । धर्मध्यान में लीन होता हुधा दिन का गोप भाग व्यतीत करे । फिर सांध्याकालीन सामायिक कर स्वाध्याय से निद्रा को जीतता हुआ पवित्र संस्तर पर रात्रि को व्यतीत करे । उपवास के दिन .. प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन सामायिक आदि क्रियाओं को करके प्रासुक द्रव्य से ....... जिनेन्द्र भगवान की पूजा करे । तदन्तर स्वाध्याय और ध्यान के द्वारा समस्त दिन, ... रात्रि और तृतीय दिन के अर्थ भाग को व्यतीत करे । इस प्रकार समस्त पाप कार्यों से निवृत होकर जो सोलह पहरों को व्यतीत करता है. उसके पूर्ण अहिंसावत होता है । देशवती श्रावकों के भोगोपभोग मूलक ही स्थावर जीवों की हिसा होती है 1 परन्तु उपवास के दिन भोगोपभोग का त्याग हो चुकता है, इसलिये हिंसा का अंश भी उनके नहीं होता । वचन गुप्ति होने से असत्य पाय से निवृत्ति है, सब प्रकार की वस्तुओं के ग्रहण का अभाव होने से चोरी से निवृत्ति है, मैथुन का त्याग होने से प्रबहा पाप से JANMAN
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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