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________________ APE । । १६० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि प्रकार के आहार का त्याग करना उपवास हैं सिर्फ पानी लेना अनुपवास है और एक बार भोजन करना एकाशन है। · प्रश्न :--उपवास के दिन क्या करना चाहिये ? उत्तर :--उपवास के दिन पांच पापों, अलंकार धारण करना, खेती ग्रादि प्रारम्भ करना, चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों का लेपन करना, पुष्प मालाएँ धारण करना या पुष्पों को सुचना, स्नान करना, अञ्जन, काजल, सुरमा आदि लगाना तथा नाक से नस आदि सूचना इन सबका त्याग करना चाहिये । पञ्चानां पापानामलं क्रियारम्भ गन्ध पुष्पाणाम् । - स्नानाजन नस्याना मुपवासे परिहृतिं कुर्यात् ।।६२॥ उपवास करने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह उपवास के दिन हिंसा, असत्य, - चौर्य, कुशील और परिग्रह इन पाँच पापों का त्याग करे । शरीर की सजावट, वाणिज्य आदि व्यापार तथा गन्ध पुष्प आदि के प्रयोग और स्नान, अजन तथा नस आदि के सेवन का परिहार-परित्याग करे । यह सब उपलक्षण है, अतः गीत नृत्य आदि राग के कारणों का भी त्याग पा जाता है । विशेषार्थ :---उपवास का मूल उद्देश्य कषाय, विषय और पाहार का त्याग करना है । जिसमें मात्र पाहार का त्याग किया जाता है, कषाय और विषयों-स्पर्शनादि । पञ्च इन्द्रियों के विषयों का त्याग नहीं किया जाता बह उपवास नहीं कहलाता, किन्तु । लङ्घन कहलाती है । इसी उद्देश्य को चरितार्थ करने के लिये प्राचार्य ने उपवास के दिन न करने योग्य कार्यों का निर्देश किया है । न करने योग्य कार्यों में स्नान का भी निषेध बतलाया है, सो यहां स्नान शब्द से तेल तथा उदर्तन आदि लगाकर किय जाने वाले विशिष्ट स्नान का त्याग समझना चाहिये । . शुद्ध प्रामुक जल से किये हुए । साधारण स्नान का निषेध नहीं है, क्योंकि उसके बिना जिनेन्द्र भगवान् का अभिषेक तथा पूजन प्रादि की क्रिया नहीं हो सकती ! श्लोक में जिन कार्यों के न करने के लिये प्राचार्य ने निर्देश किया है, वे उपलक्षण मात्र हैं। इसलिये रागवर्धक गीत, नत्य प्रादि का भी उस दिन त्याग करना चाहिये, यह सिद्ध होता है। प्रश्न :---ौर भी क्या करना चाहिये ? .. . उत्तर :--उपवास करने वाला व्यक्ति उत्कंपिटन होता हुनः कानों से
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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