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अध्याय : पांचवां ]
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प्रकार के आहार का प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमी के दिन व्रतविधान की इच्छा से त्याग करना प्रोषधोपवास जानना चाहिये । यहाँ 'सदा' शब्द देने से यह बात सिद्ध की गई है कि यह चार प्रकार के साहार का त्याग सदा के लिये - जीवन पर्यन्त की अष्टमी-चतुर्दशी के लिये होना चाहिये, न कि दो-चार माह की अष्टमी-चतुर्दशी के लिये । इसी प्रकार 'इच्छाभिः' पद देने से यह सिद्ध किया गया है कि यह त्याग अत धारण करने को भावना से होना चाहिये, न कि लोक व्यवहार में किये हुए धारणा आदि की भावना से । अपनी किसी माँग को स्वीकृत कराने के लिये जो साहार त्याग किया जाता है, उसे धारणा कहते हैं । धारणा देने के लिये किया गया आहार त्याग प्रोषधोपचास में सम्मिलित नहीं है ।
विशेषार्थ :-मुनि व्रत में पराश्रित. भोजन होने के कारण चाहे जब निराहार रहना पड़ता है। यदि गृहस्थ अवस्था में निराहार रहने का अभ्यास नहीं किया है, तो मुनि पद में निराहार रहने का अवसर प्राने पर संबलेश होगा, इसलिये गृहस्थ को यह आवश्यक नियम रखा गया है कि प्रत्येक अष्टमी और चतुर्दशी को चार प्रकार के आहार का बुद्धिपूर्वक त्याग कर निराहार रहने की शिक्षा ग्रहण करें । दाल,
भात, रोटी आदि अशान कहलाते हैं, प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमी की इन चार प्रकार र के अाहारों का त्याग करना प्रोषधोपवास कहलाता है । प्रोषधोपवास पद का शटदार्थ
ग्रन्थकर्ता १६ वें श्लोक में स्वयं करेंगे । जैन धर्म में अष्टमी और चतुर्दशी को अनादि पर्व माना गया है। प्रत्येक मास में दो अष्टमी और दो चतुर्दशी इस प्रकार चार पर्व पाते हैं । इन पर्वो के दिन व्रत धारण की इच्छा से चार प्रकार के पाहार का त्याग करना चाहिये । यह त्याग सदा के लिये अर्थात् जीवनपर्यन्तं के लिये होता है, समय की अवधि को लेकर नहीं होता । कुछ टीकाकार 'सदेच्छाभिः' के स्थान पर सदिच्छाभिः पाठ की कल्पना कर उसकी व्याख्या करते हैं--प्रशस्त अभिप्राय से । परन्तु संपादन के लिये प्राप्त प्रतियों में 'सदेच्छाभिः' यही पाट मिलता है, तथा संस्कृत-दीकाकार ने. भी 'सदेच्छाभिः' पद की ही टीका की है। इसलिये नवीन पाठ की कल्पना करना उचित मालूम नहीं होता ! प्रोषधोपवास तप का स्वरूप है और तप शक्ति के अनुसार परिवर्तित होता रहता है । ऋतुचक्र का भी मनुश्य की शत्ति पर प्रभाव पड़ता है ! इसलिये पीछे चलकर प्राचार्यों ने प्रोपधोपवासव्रत को उपवास, अनुपचास तथा एकाशन नाम देकर उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्यं इन तीन भेदों में विभक्त कर दिया है । चारों
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